किस नीड़ से भला
कहाँ रुके है
पर निकले परिंदे
नीड़ का मुहाना ही
बनता है
पहला मंच
जहां से उड़ा जाता है
और बैया
बस देखती है
वह आखेट
और तन्द्रा तोड़
ताकती है फिर
नर बैया की और
ताकि फिर से बना सके
एक और लांच पैड
कुछ नए परिन्दों के
आखेट के लिए
और वह यूँ ही
दोहराती रहती है
सिलाई
धागा पर धागा
कहाँ रुके है
पर निकले परिंदे
नीड़ का मुहाना ही
बनता है
पहला मंच
जहां से उड़ा जाता है
और बैया
बस देखती है
वह आखेट
और तन्द्रा तोड़
ताकती है फिर
नर बैया की और
ताकि फिर से बना सके
एक और लांच पैड
कुछ नए परिन्दों के
आखेट के लिए
और वह यूँ ही
दोहराती रहती है
सिलाई
धागा पर धागा
सुनीता धारीवाल
कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें