शनिवार, 10 अक्टूबर 2026

मलाल

जिंदगी आराम से बिताई जा सकती थी
 बेमतलब भाग दौड़ बचाई जा सकती थी

तेज धूप मे जलना कहाँ जरूरी था 
धूप पर्दों मे छुपाई जा सकती थी

साहस था समझदारी नदारद निकली
थोड़ी रहती तो उम्मीद बचाई जा सकती थी

उसने सब खोया बस हमसे मुहब्बत कर के
 उसकी भी जान बचाई जा सकती थी 

सब कुछ गवा के होश मे आना  ही न हुआ 
होश की भी कोई दवा बनाई जा सकती थी

 मुड़ के देखने मे रीढ़ मे ऐंठन सी होती है 
सामने देख कर पगडण्डी बनाई जा सकती है

सुनीता धारीवाल

सोमवार, 24 अगस्त 2026

अल्प उपहार मति बंधन


'अहसान और प्रलोभन' का मनोवैज्ञानिक जाल: कूटनीति से लेकर बाजार तक


मानव स्वभाव और मनोविज्ञान का यह एक अत्यंत रोचक और गहरा पहलू है कि एक व्यक्ति, सरकार या व्यापारी—तीनों ही इस अदृश्य मनोवैज्ञानिक नियम का उपयोग अपने स्वार्थ या उद्देश्य को पूरा करने के लिए करते हैं। जब किसी को बिना मांगे कोई छोटी वस्तु, रियायत या सुविधा मिलती है, तो उसका अवचेतन मन मानसिक रूप से उस कर्ज को चुकाने के लिए विवश हो जाता है।

1. चाणक्य का प्राचीन कथन और उसका मूल सार

प्राचीन काल में चाणक्य नीति के 'दान-संधि' खंड में इस मनोवैज्ञानिक तंत्र को बहुत स्पष्ट रूप से समझाते हुए कहा गया था—'अल्प-उपहार से मति-बंधन' यानी छोटे-छोटे तोहफ़ों या उपकारों के माध्यम से सामने वाले व्यक्ति की बुद्धि (मति) को अपने वश में (बंधन) कर लेना।

  • चाणक्य का मानना था कि हर व्यक्ति के भीतर एक सूक्ष्म अहंकार और ऋण चुकाने की स्वाभाविक प्रवृत्ति होती है।
  • जब आप किसी को अचानक कोई छोटा उपहार या अप्रत्याशित मदद देते हैं, तो उसकी निर्णय लेने की स्वतंत्र क्षमता (मति) आपके प्रभाव में बंध जाती है।

2. आधुनिक मनोविज्ञान में इसकी सटीकता

चाणक्य की यह हजारों साल पुरानी नीति आज की आधुनिक बिहेवियरल साइकोलॉजी (Behavioral Psychology) और समाजशास्त्र में उतनी ही सटीक बैठती है।

  • पारस्परिकता का नियम (Law of Reciprocity): आधुनिक मनोविज्ञान में इसे 'Strategic Reciprocity' या 'Uninvited Debts' कहा जाता है। रॉबर्ट सियालदिनी (Robert Cialdini) जैसे प्रसिद्ध मनोवैज्ञानिकों ने भी अपनी रिसर्च में साबित किया है कि जब कोई हमें कुछ देता है, तो हमारे मन में तुरंत उसे कुछ वापस लौटाने या उसके पक्ष में झुकने का मनोवैज्ञानिक दबाव पैदा हो जाता है।
  • दिमाग का 'सोशल इक्विलिब्रियम' (Social Equilibrium Mechanism): इंसानी दिमाग किसी भी 'अहसान' या मुफ्त मिली चीज़ को एक भारी मानसिक तनाव या कर्ज के रूप में दर्ज करता है। जब तक वह उसका बदला नहीं चुकाता, तब तक उसका तंत्र उसे असहज बनाए रखता है। यही कारण है कि आधुनिक मार्केटिंग, राजनीति और व्यक्तिगत संबंध इस नियम पर आज भी पूरी तरह टिके हैं।

3. यह खेल अलग-अलग स्तरों पर कैसे खेला जाता है?

  • व्यक्तिगत स्तर पर (व्यक्ति से व्यक्ति):
    • कार्य करने का तरीका: एक चालाक व्यक्ति शुरुआत में किसी सहकर्मी या पड़ोसी को बहुत छोटा, गैर-ज़रूरी उपकार या मदद देता है। जब सामने वाला उस अहसान को स्वीकार कर लेता है, तो उसके मन में एक मनोवैज्ञानिक दबाव बन जाता है।
    • नतीजा: जब वह व्यक्ति बाद में कोई बड़ा या मुश्किल काम मांगता है, तो सामने वाला उस मानसिक बोझ के कारण 'ना' नहीं कह पाता और अनचाहे में उसकी बात मान लेता है।
  • राजनीतिक स्तर पर (सरकार से मतदाता / फ्रीबीज की नीति):
    • कार्य करने का तरीका: आज की सियासत में राजनीतिक दल इसी नीति का व्यापक उपयोग 'फ्रीबीज' (Freebies - मुफ्त की रेवड़ियाँ) के रूप में करते हैं, जैसे चुनाव से ठीक पहले मुफ्त बिजली, पानी या यात्रा देना।
    • नतीजा: जनता इसे सरकार का स्नेह समझती है, लेकिन इसके बदले में उनका वोट बैंक के रूप में बंधक बन जाना तय हो जाता है। लोग विकासात्मक मुद्दों की बजाय उस 'मुफ्त' के अहसान के दबाव में मतदान करते हैं।
  • व्यापारिक स्तर पर (व्यापारी से ग्राहक):
    • कार्य करने का तरीका: कॉर्पोरेट और व्यापारी वर्ग इसका इस्तेमाल बिक्री बढ़ाने के लिए 'फ्री सैंपल', 'बाय वन गेट वन फ्री' या मुफ्त सेवाओं (Free Trials) के जरिए करते हैं।
    • नतीजा: ग्राहक को जब कोई चीज मुफ्त मिलती है, तो उसके भीतर कृतज्ञता जागती है, जिससे वह व्यापारी के प्रति वफादार हो जाता है और भविष्य में महंगे उत्पाद खरीदने के लिए तैयार हो जाता है।

4. इस नीति के मुख्य दुष्प्रभाव क्या हैं?

  • निर्णय लेने की स्वतंत्रता खत्म होना: व्यक्ति, मतदाता या ग्राहक अपनी स्वतंत्र बुद्धि से सही-गलत का फैसला करने की क्षमता खो देता है। उसका निर्णय तर्क पर नहीं, बल्कि पिछले उपकार या मुफ्त की वस्तु के दबाव पर आधारित होता है।
  • समाज और अर्थव्यवस्था का पतन: राजनीति में नीतियों की जगह सिर्फ मुफ्त की रेवड़ियों का चलन बढ़ने से देश का खजाना बुनियादी विकास (शिक्षा, स्वास्थ्य और इंफ्रास्ट्रक्चर) से भटक जाता है, जिससे दीर्घकालिक आर्थिक संकट पैदा होता है।

5. इस मानसिक जाल से कैसे बचा जा सकता है?

  • 'अहसान' की भावना से मुक्त रहें: जब भी कोई आपको बिना मांगे कोई बड़ी सुविधा या मुफ्त उपहार दे, तो तुरंत उसके पीछे के मनोवैज्ञानिक दबाव को भांप लें।
  • तर्क और योग्यता को प्राथमिकता दें: वोट देते समय या कोई बड़ा व्यावसायिक निर्णय लेते समय मुफ्त के प्रलोभनों के बजाय योग्यता और दूरगामी परिणामों को आधार बनाएं।

चाणक्य के समय से लेकर आज के आधुनिक युग तक, यह सिद्ध हो चुका है कि जो व्यक्ति या समाज इस मनोवैज्ञानिक 'अहसान के पिंजरे' को समझ जाता है, वह कभी भी किसी के इशारों की कठपुतली नहीं बनता।


सुनीता धारीवाल 


मंगलवार, 28 जुलाई 2026

मांताएँ थोड़ा सा पीछे हटना सीखें


​ओझल होने की कला: बच्चों के बड़े होने के लिए माँ का पीछे हटना क्यों जरूरी है



​एक सच्ची माँ को सही समय पर "ओझल" (पीछे हट) जाना चाहिए—नहीं तो बच्चा 40 की उम्र पार करने के बाद भी बच्चा ही बना रहता है। युंगियन विश्लेषक क्लारिसा पिंकोला एस्टेस के अनुसार, "ओझल होने" का मतलब बच्चे को शारीरिक रूप से छोड़ देना या प्यार देना बंद कर देना नहीं है। इसके बजाय, इसका मतलब है बच्चे के जीवन में "मुख्य महिला" की भूमिका से खुद को पीछे हटाना। इसके लिए जरूरी है कि बच्चे को अपने फैसले लेने, अपना साथी चुनने और अपनी राह खुद बनाने की जगह दी जाए। अगर कोई माँ यह कदम उठाने में नाकाम रहती है, तो बच्चा कभी एक स्वतंत्र इंसान नहीं बन पाता और दशकों तक अपनी माँ का ही एक मनोवैज्ञानिक विस्तार बनकर रह जाता है।

​माँ बनने का यह सफर तीन मुख्य चरणों से होकर गुजरता है:

  • ​0 से 7 वर्ष (विलय/Fusion): माँ और बच्चा मूल रूप से एक होते हैं। यह स्थिति स्वाभाविक, स्वस्थ और जरूरी है।
  • ​7 से 14 वर्ष (अलगाव/Separation): माँ धीरे-धीरे नियंत्रण छोड़ना शुरू करती है। बच्चा अपने कपड़े, दोस्त और शौक खुद चुनना शुरू करता है।
  • ​14 से 21 वर्ष (पीछे हटना/Retreat): माँ एक बड़ा कदम पीछे खींचती है। 21 साल की उम्र के बाद, माँ एक नियंत्रक के रूप में "ओझल" हो जाती है और एक बराबर के वयस्क साथी (Peer) की भूमिका में आ जाती है।

​जब कोई माँ पीछे हटने से इनकार कर देती है, तो इससे वही स्थिति पैदा होती है जिसे विश्लेषक मैरी-लुईस वोन फ्रांज ने "मदर कॉम्प्लेक्स" (Mother Complex) कहा है। यह असल जिंदगी में कई तरह से दिखाई देता है—जैसे एक 35 साल का पुरुष जो अपनी पत्नी से ज्यादा अपनी माँ की सलाह को प्राथमिकता देता है, या एक 32 साल की महिला जो सिर्फ इसलिए शादी करने से मना कर देती है क्योंकि «मम्मी को पसंद नहीं है»। ये लोग "बुरे बच्चे" नहीं हैं—ये ऐसे वयस्क हैं जिन्हें कभी बड़े होने ही नहीं दिया गया। कागजों पर उम्र चाहे जो भी हो, वे मानसिक रूप से 14 साल की उम्र पर ही अटके रह जाते हैं।

​यह पहचानना कि माँ अभी तक "ओझल" नहीं हुई है, बहुत आसान है। इसके कुछ मुख्य संकेत हैं:

  • ​केवल "हाल-चाल लेने" के नाम पर वयस्क बच्चे को सप्ताह में तीन बार से ज्यादा फोन करना।
  • ​बच्चे के जीवनसाथी या पार्टनर की कमियाँ निकालना, जैसे वह उनका अपना पार्टनर हो।
  • ​बच्चे के पैसों, करियर की उलझनों या निजी झगड़ों का पूरा हिसाब माँगना।
  • ​जब बच्चा बिना सलाह लिए कोई फैसला ले, तो बुरा मान जाना या नाराजगी जताना।
  • ​30 साल के बड़े हो चुके बच्चे से बहस के दौरान «मैंने तुम्हारे लिए कितनी ही रातें जागकर बिताई हैं» जैसी बातों को हथियार की तरह इस्तेमाल करना।

​"ओझल होने" की कला में महारत हासिल करने का मतलब संबंध तोड़ना या मन में कड़वाहट रखना नहीं है; इसका सीधा सा मतलब है खुद से पहल करना बंद करना। एक माँ के लिए इसके मुख्य कदम हैं:

  1. ​पहले खुद फोन न करना।
  2. ​जब तक खुलकर मदद न माँगी जाए, तब तक बिन माँगी सलाह या मदद न देना।
  3. ​बच्चे के फैसलों का मूल्यांकन न करना और न ही उसके पार्टनर पर कोई टिप्पणी करना।

​फिर भी, इस बदलाव का एक ऐसा खामोश सच है जिस पर शायद ही कभी खुलकर बात की जाती है: जब माँ पीछे हटती है, तो उसके साथ क्या होता है।

​जब एक माँ पीछे हटती है, तो उसे अक्सर उस जगह एक खालीपन नजर आता है जहाँ उसके जीवन के बीस साल बीते थे। कई माताएं दोबारा बच्चे की जिंदगी में नियंत्रण की नीयत से नहीं, बल्कि इसलिए दखल देने लगती हैं क्योंकि उनके पास अपना कहने के लिए कुछ बचता ही नहीं है। किसी माँ से यह कह देना बहुत आसान है कि "अब अपने आप पर ध्यान दो", लेकिन जब इंसान अंदर से पूरी तरह खाली महसूस कर रहा हो तो ऐसा करना लगभग नामुमकिन होता है—क्योंकि जिस औरत ने दो दशक सब कुछ न्योछावर करने में बिता दिए, उसके पास खुद की नई जिंदगी बनाने की ऊर्जा ही नहीं बचती।

​यह आत्मनिर्भरता किसी नए शौक से शुरू नहीं होती; इसकी शुरुआत खुद को दोबारा हासिल करने से होती है। अपनी ऊर्जा को वापस पाना, तनाव कम करना और अपनी सेहत को सुधारना ही वे जरूरी कदम हैं, जिनसे एक माँ आखिरकार खुद को प्राथमिकता देना सीख सकती है और जिंदगी के अगले पड़ाव में पूरे आत्मविश्वास के साथ कदम रख सकती है।

मंगलवार, 14 जुलाई 2026

मदद, अहंकार और इंसान का मनोविज्ञान


एक वैचारिक लेख — मानवीय व्यवहार और अपेक्षाओं का गहरा विश्लेषण

​अक्सर समाज में यह एक आम शिकायत सुनने को मिलती है कि "हमने जिसकी मुसीबत में मदद की, वही हमसे दूर हो गया।" लोग अक्सर ऐसे व्यक्तियों को नाशुक्रा, मतलबी या अहसानफ़रामोश मान लेते हैं। चारों तरफ एक निराशावादी सोच घर कर जाती है कि भलाई का तो ज़माना ही नहीं रहा। लेकिन अगर हम इंसानी मनोविज्ञान और परिस्थितियों की गहराइयों में उतरें, तो सच इससे बिल्कुल अलग और बेहद स्वाभाविक नज़र आता है।

​जीवन का चक्र ही ऐसा है जहाँ कभी हम किसी की मदद करने की स्थिति में होते हैं, तो कभी हमें स्वयं मदद की आवश्यकता होती है। यह पूरी तरह से समय और परिस्थितियों का खेल है। न तो किसी की सहायता करना बुरा है और न ही किसी से सहायता लेना। वास्तव में, समस्या उस सहायता के साथ अनजाने में जुड़ जाने वाली हमारी 'अपेक्षाओं' (Expectations) से उत्पन्न होती है, जो अंततः हमें दुखी करती हैं। आइए, इस बात को मनोवैज्ञानिक दृष्टिकोण से समझने का प्रयास करते हैं कि आखिर क्यों लोग मदद पाने के बाद दूरी बना लेते हैं।

​१. हीनता की भावना और अतीत का डर

​जब आप किसी व्यक्ति की सहायता करते हैं, तो उस क्षण जाने-अनजाने में आप एक ऊंचे पायदान पर होते हैं और सहायता प्राप्त करने वाला व्यक्ति निचले पायदान पर। किसी के सामने हाथ फैलाना या लाचार होना मनुष्य के भीतर हीनता की भावना (Inferiority Complex) को जन्म देता है। समय हमेशा एक जैसा नहीं रहता; व्यक्ति उस बुरे दौर से बाहर निकल जाता है, लेकिन उसका अतीत उसके साथ रहता है।

​अब वह व्यक्ति जब भी अपने मददगार यानी आपको देखता है, तो उसे अपना वह कमज़ोर और लाचार वक्त याद आ जाता है। आपका चेहरा उसके लिए एक मनोवैज्ञानिक ट्रिगर बन जाता है, जो उसे बार-बार उसकी पुरानी बेबसी की याद दिलाता है। वह व्यक्ति आपका सामना करने से सिर्फ इसलिए बचता है ताकि वह उस नकारात्मक ऊर्जा और हीनता के अहसास से दूर रह सके। वह नाशुक्रा नहीं है, वह बस अपने उस कमज़ोर अतीत से दूर भागने का प्रयास कर रहा है।

​२. सूक्ष्म दंभ और अहंकार का जन्म

​कई बार हम सामने वाले की दयनीय स्थिति देखकर इतने भावुक हो जाते हैं कि उसके बिना मांगे ही आगे बढ़कर उसकी मदद कर देते हैं। उस समय हमें एक आंतरिक सुकून मिलता है। परंतु, जब सामने वाले की आँखों में लाचारी के आंसू होते हैं और वह हमारे सामने झुक रहा होता है, तो उसे देखकर हमारे भीतर एक बहुत ही बारीक, सूक्ष्म दंभ (Ego) जागृत हो जाता है।

​मनोविज्ञान कहता है कि हमें वह सुकून इसलिए मिला क्योंकि उस व्यक्ति ने हमारी मदद स्वीकार करके हमें 'ऊंचा' होने का अवसर दे दिया। हमारा 'मैं' यानी अहंकार बड़ा हो जाता है। भूल तब होती है जब हम मन में एक अनजानी अपेक्षा रख लेते हैं, जिसकी खबर सामने वाले को बिल्कुल नहीं होती।

​सत्य की कसौटी: सच तो यह है कि जब आपने किसी की मदद की और उस वक्त आपको जो आंतरिक खुशी और संतोष मिला, आपकी भलाई का पुरस्कार तो आपको उसी क्षण मिल गया था। हिसाब तो वहीं चुकता हो गया था।


​३. गरिमा को ठेस और सामाजिक प्रदर्शन

​अक्सर लोग मदद करने के बाद एक बड़ी भूल कर बैठते हैं। वे उस इंसान को, उसके परिवार को, या उसके मासूम बच्चों को बार-बार उस मदद का अहसास कराते हैं। जब भी मिलते हैं, तुरंत यह जता देते हैं कि "देखो तुम्हारा कैसा समय था और मैंने तुम्हारी कितनी मदद की थी!" इतना ही नहीं, पीठ पीछे समाज में दूसरों के सामने भी इसका बखान किया जाता है।

​कोई भी आत्मसम्मान वाला व्यक्ति अपनी गरिमा और प्रतिष्ठा को बार-बार ठेस पहुँचते हुए नहीं देख सकता। जब किसी के स्वाभिमान पर चोट लगती है, तो नतीजा यही होता है कि वह व्यक्ति धीरे-धीरे दूरी बनाना ही उचित समझता है।

​एक व्यावहारिक और आत्मीय दृष्टिकोण

​यदि हम वास्तव में किसी की मदद करना चाहते हैं, तो हमारा दिल बहुत बड़ा होना चाहिए। हमें स्वयं को भाग्यशाली समझना चाहिए कि प्रकृति ने हमें देने वाला बनाया है, लेने वाला नहीं। मदद कीजिए, उसका आनंद महसूस कीजिए और उसे वहीं भूल जाइए। जो मदद देकर जता दी गई, वह सहायता नहीं बल्कि एक सौदा बन जाती है। और सौदा तो व्यापार है, जहाँ नफ़ा-नुकसान तय है।

​जब आप समझदारी से मदद लेने वाले व्यक्ति की व्यक्तिगत और सामाजिक गरिमा का सम्मान करते हैं, और उसे कभी अहसान का अहसास नहीं होने देते, तो वह व्यक्ति जीवन भर आपका सच्चा हितैषी बना रहता है। ऐसा करके आप समाज में एक व्यक्ति को खोते नहीं हैं, बल्कि एक मजबूत और वफ़ादार दोस्त कमा लेते हैं, जो आपके सुख-दुख में हमेशा आपके साथ खड़ा रहेगा। भविष्य में जब भी आप उससे मिलेंगे, तो आपको देखकर उसके चेहरे पर आने वाली सच्ची मुस्कान ही आपकी भलाई का सबसे बड़ा उपहार होगी।

​सच्ची सहायता वही है जो चुपचाप, सम्मान के साथ की जाए और जिसे करके भुला दिया जाए।

रविवार, 31 मई 2026

क्या समाज सचमुच बदल गया है?




क्या समाज सचमुच बदल गया है?

कई बार हम मान लेते हैं कि समाज बदल गया है। लड़कियाँ पढ़ रही हैं, काम कर रही हैं, व्यवसाय कर रही हैं, निर्णय ले रही हैं। ऊपर से देखने पर सब कुछ आधुनिक दिखाई देता है। लेकिन कभी-कभी कोई छोटी-सी घटना हमें याद दिला देती है कि बदलाव जितना दिखाई देता है, उतना गहरा अभी नहीं हुआ है।

मैं एक छोटी उद्यमी हूँ। मेरा व्यवसाय बहुत बड़ा नहीं है, लेकिन उससे अनेक महिलाओं को काम मिलता है। मेरे लिए काम केवल पैसे कमाने का माध्यम नहीं है। सच कहूँ तो काम मेरी आदत है, मेरा जुनून है और शायद मेरे व्यक्तित्व का एक अभिन्न हिस्सा भी है।

मैं उन लोगों में से हूँ जिन्हें कुछ नया सीखने, कुछ नया बनाने और कुछ नया करने से खुशी मिलती है। जब मैं किसी नए विचार को आकार देती हूँ, कोई नया उत्पाद तैयार करती हूँ या किसी रचनात्मक समस्या का समाधान खोजती हूँ, तो मुझे एक विशेष प्रकार की संतुष्टि मिलती है। काम न करूँ तो बेचैनी महसूस होती है, लेकिन काम करते हुए मैं स्वयं को जीवंत महसूस करती हूँ।

मेरे लिए यह केवल व्यक्तिगत संतुष्टि का विषय भी नहीं है। मेरे साथ अनेक महिलाएँ जुड़ी हुई हैं। उनकी आय से किसी के बच्चों की फीस भरती है, किसी के घर का राशन आता है, कोई किराया चुकाती है, कोई अपनी आर्थिक स्वतंत्रता की ओर एक कदम बढ़ाती है। जब मेरे काम से किसी और के जीवन में भी सकारात्मक परिवर्तन आता है, तब मेरे प्रयासों का अर्थ और गहरा हो जाता है।

लेकिन इसी यात्रा में मुझे समाज की एक ऐसी परत दिखाई दी, जिसके बारे में मैं सोचती थी कि शायद अब वह समाप्त हो चुकी है।

एक दिन मुझे कहा गया—

"आपको शर्म नहीं आती हमारे भाई की सार्वजनिक रूप से तौहीन करते हुए? भाई की इज़्ज़त का कुछ तो ख़याल करो।"

मैं कुछ क्षणों के लिए बिल्कुल समझ ही नहीं पाई कि मुझसे यह बात क्यों कही जा रही है।

मैं अपने पति का जितना सम्मान करती हूँ, शायद उसे शब्दों में पूरी तरह व्यक्त नहीं कर सकती। उन्होंने हमेशा मेरी स्वतंत्रता की रक्षा की है, मेरे निजी निर्णयों का सम्मान किया है और मुझे अपने व्यक्तित्व के साथ विकसित होने की पूरी स्वतंत्रता दी है। ऐसे जीवनसाथी हर किसी को नहीं मिलते।

पहले तो मुझे लगा कि शायद कोई गलतफहमी हुई है। फिर धीरे-धीरे समझ आया कि यह टिप्पणी मेरे व्यवसाय को लेकर थी।

कुछ समय पहले मैंने सोशल मीडिया पर एक रील बनाई थी, जिसमें मैं स्वयं अपने उत्पादों के बारे में बता रही थी। मेरे लिए यह अपने काम को लोगों तक पहुँचाने का एक साधारण प्रयास था। लेकिन कुछ लोगों ने उसे बिल्कुल अलग नज़रिए से देखा।

मुझे धीरे-धीरे समझ आया कि वे मेरे काम को उद्यमिता की तरह नहीं देख रहे थे। वे उसे आर्थिक आवश्यकता के संकेत की तरह देख रहे थे। उनके लिए यह कल्पना करना कठिन था कि कोई महिला केवल अपने काम से प्रेम के कारण, कुछ नया बनाने की खुशी के कारण, या अपने व्यवसाय को आगे बढ़ाने के लिए स्वयं सामने आकर अपने उत्पादों का प्रचार कर सकती है।

उनकी नज़र में यदि पत्नी स्वयं सामान बेच रही है, तो इसका अर्थ यह है कि पति पर्याप्त नहीं कमा रहा। और यही सोच उन्हें मेरे पति की "इज़्ज़त" से जुड़ी दिखाई देती थी।

उस क्षण मुझे पहली बार महसूस हुआ कि समस्या मेरे काम में नहीं थी। समस्या इस बात में थी कि वे मेरे काम को किस दृष्टि से देख रहे थे।

उन्होंने यह नहीं देखा कि मैं एक व्यवसाय चला रही हूँ।

उन्होंने यह नहीं देखा कि मेरे साथ अन्य महिलाएँ भी काम कर रही हैं।

उन्होंने यह नहीं देखा कि मैं अपनी रचनात्मकता को आकार दे रही हूँ।

उन्होंने यह नहीं देखा कि मैं अपने सपनों को जीने का प्रयास कर रही हूँ।

उन्होंने केवल यह देखा कि एक विवाहित महिला स्वयं अपने उत्पाद बेच रही है।

और शायद इस पूरे अनुभव का सबसे महत्वपूर्ण निष्कर्ष यही है कि उन्होंने मेरे काम को मेरे व्यक्तित्व, मेरी रचनात्मकता या उन महिलाओं की आजीविका के संदर्भ में नहीं देखा जो इस काम से जुड़ी थीं। उन्होंने उसे केवल एक पुरुष की सामाजिक प्रतिष्ठा के चश्मे से देखा।

यही वह क्षण था जब मुझे एहसास हुआ कि समाज बदल तो रहा है, लेकिन स्त्री के काम को उसकी अपनी उपलब्धि मानने की यात्रा अभी अधूरी है।

आज भी बहुत से लोग मानते हैं कि यदि कोई महिला काम कर रही है, तो उसके पीछे कोई आर्थिक मजबूरी होगी। वे यह स्वीकार करने में कठिनाई महसूस करते हैं कि काम किसी स्त्री के लिए आत्म-अभिव्यक्ति भी हो सकता है, रचनात्मकता भी हो सकता है, आनंद भी हो सकता है और समाज में योगदान का माध्यम भी हो सकता है।

मुझे लगता है कि हमारे समाज में संघर्ष करती हुई महिला को अपेक्षाकृत आसानी से स्वीकार कर लिया जाता है। यदि वह मजबूरी में काम कर रही है, तो लोग सहानुभूति रखते हैं। लेकिन यदि वही महिला अपनी इच्छा से काम कर रही हो, आर्थिक रूप से सुरक्षित हो और फिर भी कुछ नया बनाना चाहती हो, तो वह कई लोगों की स्थापित धारणाओं को चुनौती देने लगती है।

समाज में बहुत परिवर्तन आया है। यह भी सच है कि आज पहले की तुलना में अधिक महिलाएँ अपने सपनों को जी रही हैं। लेकिन यह भी उतना ही सच है कि परंपरागत सोच की एक परत आज भी जीवित है। अधिकांश समय वह दिखाई नहीं देती, लेकिन अवसर मिलने पर वह अपनी उपस्थिति दर्ज अवश्य कराती है।

फिर भी मैं काम करती हूँ।

इसलिए नहीं कि मुझे किसी को कुछ साबित करना है।

इसलिए नहीं कि मुझे अपनी पसंद का बचाव करना है।

मैं काम करती हूँ क्योंकि सृजन मुझे खुशी देता है।

मैं काम करती हूँ क्योंकि इससे कई अन्य महिलाओं के घरों में भी आय पहुँचती है।

मैं काम करती हूँ क्योंकि मेरे लिए काम केवल कमाई नहीं, बल्कि अभिव्यक्ति है।

और शायद यही वह बात है जिसे समाज को अभी पूरी तरह समझना बाकी है—

जब एक महिला काम करती है, तो वह केवल पैसे नहीं कमाती।

वह पहचान बनाती है।

वह अवसर पैदा करती है।

वह आत्मविश्वास गढ़ती है।

और कई बार अनजाने में उन पुरानी मान्यताओं को भी चुनौती देती है, जो सदियों से यह तय करती आई हैं कि उसे कैसा जीवन जीना चाहिए।

सुनीता धारीवाल 

हमारे रीति रिवाज परंपरा से तर्क तक - लेख


मानव समाज अत्यंत रोचक है। पूरे विश्व में मानव कबीलों ने साथ-साथ, समूहों और झुंडों में रहते हुए अपनी-अपनी मान्यताएँ, परंपराएँ और रीति-रिवाज विकसित किए। हर रीति-रिवाज के पीछे कोई न कोई वजह, अनुभव और सामाजिक उद्देश्य छिपा होता है। आज इन्हीं विषयों पर कुछ रोचक चर्चा करते हैं।
सबसे पहले इनके शाब्दिक अर्थ समझते हैं।
‘रीति’ का अर्थ है — पद्धति और ‘रिवाज’ का अर्थ है — चलन।
अर्थात किसी विशेष कर्म को करने की वह पद्धति जो लंबे समय से लगातार चली आ रही हो।
‘परंपरा’ शब्द संस्कृत भाषा से आया है, जिसका शाब्दिक अर्थ है — बिना व्यवधान के किसी श्रृंखला या क्रम का निरंतर जारी रहना।
यानि कुछ ऐसे कर्म और व्यवहार जो पीढ़ी दर पीढ़ी बिना अधिक सवाल किए लगातार निभाए जाते रहे हों।
आज के युग में, जहाँ इंसान मंगल ग्रह पर कॉलोनी बसाने के रास्ते खोज रहा है, अंतरिक्ष पर्यटन की सुविधाएँ विकसित कर रहा है, वहीं वह सदियों पुरानी परंपराओं को भी उसी श्रद्धा और निरंतरता से निभाता चला आ रहा है।
मनुष्य वास्तव में एक अत्यंत रोचक सामाजिक प्राणी है। वह हमेशा व्यस्त रहता है — कुछ नया रचने में, कुछ पुराना सँजोए रखने में। वह भविष्य की ओर दौड़ता है, लेकिन अपनी स्मृतियों और संस्कारों को भी साथ लेकर चलता है।
हर समाज में मनुष्य का जन्म और मरण दो सबसे बड़ी घटनाएँ मानी जाती हैं, और इनके बीच का जीवन उत्सवों, मेलों और संस्कारों से भरा होता है। सदियों से मानव समाज ने शोक से अधिक उत्सवों को महत्व दिया है। यही कारण है कि हमें मानव सभ्यता के निशान कलाओं, परंपराओं, लोकगीतों और मान्यताओं में गहराई से उकेरे हुए मिलते हैं।
दुनिया भर में अनेक रोचक और रोमांचक रीतियाँ प्रचलित हैं। भारतीय समाज में भी मनुष्य के जन्म से लेकर मरण तक अनेक संस्कार पाए जाते हैं। इसके अतिरिक्त ऋतुओं, खेती, विवाह, पर्वों और सामाजिक संबंधों से जुड़े भी अनेक रिवाज हैं। पर आज हम विशेष रूप से हरियाणा प्रदेश के रीति-रिवाजों की चर्चा करेंगे।
हरियाणा, जो सिंधु घाटी सभ्यता की जीवित विरासत माना जाता है, वहाँ की परंपराएँ भारतीय सभ्यता के प्रारंभिक हस्ताक्षरों की तरह आज भी जीवित दिखाई देती हैं। यहाँ के लोकगीत, खान-पान, विवाह संस्कार, खेती से जुड़े उत्सव और पारिवारिक परंपराएँ अपने भीतर सदियों पुरानी सांस्कृतिक स्मृतियाँ सँजोए हुए हैं।
हरियाणा के गाँवों में आज भी अनेक रिवाज केवल परंपरा नहीं, बल्कि सामाजिक संबंधों को मजबूत रखने का माध्यम हैं। विवाह में गाए जाने वाले बन्ने-बन्नी के गीत, तीज और सावन के झूले, फसल कटाई के बाद सामूहिक उत्सव, नवजात शिशु के जन्म पर होने वाले संस्कार, और मृत्यु के बाद सामूहिक शोक प्रकट करने की परंपराएँ — ये सभी केवल रस्में नहीं, बल्कि समाज को एक सूत्र में बाँधे रखने वाली सांस्कृतिक डोर हैं।
समय के साथ बहुत कुछ बदला है। डिजिटल युग ने जीवन की गति, सोच और संबंधों के स्वरूप को भी प्रभावित किया है। नई पीढ़ी अब मोबाइल स्क्रीन और वैश्विक संस्कृति के बीच बड़ी हो रही है। ऐसे समय में यह प्रश्न स्वाभाविक है कि क्या आने वाली पीढ़ियाँ इन परंपराओं को समझ पाएँगी? क्या वे इनके पीछे छिपे सामाजिक और भावनात्मक अर्थों को महसूस कर पाएँगी?
परंपराओं को ज्यों का त्यों ढोना ही आवश्यक नहीं, बल्कि उन्हें समझना और समय के अनुसार संवेदनशील रूप से आगे बढ़ाना अधिक आवश्यक है। क्योंकि कोई भी संस्कृति केवल अतीत से नहीं, बल्कि वर्तमान की समझ और भविष्य की आशा से जीवित रहती है।
परिवारों में विवाह के उत्सव के दौरान अनेक लोक-कर्म और रस्में निभाई जाती हैं। हम सभी उन्हें परंपरा मानकर करते तो हैं, पर क्या कभी ठहरकर यह पूछा है कि इन्हें क्यों किया जाता है?
और यदि कभी पूछा भी हो, तो अधिकतर यही उत्तर मिला होगा —
“बेरा ना… बड़े-बूढ़े न्यू ही करते आए, हम ने भी सीख लिया।”
विवाह उत्सव में हम अनेक कर्म करते हैं, पर उनका तर्क और उद्देश्य अक्सर समझ में नहीं आता।
ज़रा सोचिए —
विवाह की कार के टायर पर पानी क्यों डाला जाता है?
दरवाजे की चौखट पर तेल क्यों डाला जाता है?
दूल्हे को घोड़ी पर बैठाकर पूरे गाँव में क्यों घुमाया जाता है?
दूल्हा-दुल्हन पर नीम क्यों झाड़ी जाती है?

ऐसे न जाने कितने कर्म हैं, जिनका पालन तो पीढ़ियों से होता आया है, लेकिन जिनका वास्तविक कारण बहुत कम लोगों को पता है।
इन सब प्रश्नों के उत्तर समझने के लिए हमें उस समय को समझना होगा, जब ये रीति-रिवाज जन्मे थे। ये परंपराएँ उस दौर की देन हैं, जब मानव कबीले एक स्थान से दूसरे स्थान तक पलायन करते हुए अंततः स्थायी रूप से बसने लगे थे। धीरे-धीरे खेती शुरू हुई और पूरा सामाजिक तथा आर्थिक ढाँचा कृषि और श्रम आधारित जीवन पर टिका हुआ था।
उस समय विवाह केवल दो व्यक्तियों का संबंध नहीं था, बल्कि दो परिवारों, श्रम-समूहों और सामाजिक इकाइयों का जुड़ाव था। इसलिए विवाह से जुड़े अनेक कर्मों का संबंध स्वास्थ्य, सुरक्षा, सामाजिक अनुशासन, श्रम-विभाजन, प्रजनन क्षमता, सामूहिक पहचान और मनोवैज्ञानिक तैयारी से था।
समय के साथ उनके मूल कारण धुंधले पड़ गए, लेकिन रस्में बची रहीं। आज आवश्यकता केवल उन्हें निभाने की नहीं, बल्कि उन्हें समझने की भी है — ताकि हम यह जान सकें कि हमारी परंपराएँ केवल अंधविश्वास नहीं, बल्कि अपने समय की सामाजिक बुद्धिमत्ता और जीवन-अनुभवों की अभिव्यक्ति भी थीं।
खेड़ा क्यों पूजते हैं?
ईश्वर की धारणा मनुष्य के भीतर बहुत प्राचीन और व्यापक रूप से पाई जाती है। आदिकाल से मनुष्य ने प्रकृति की अनेक ऐसी घटनाओं को देखा और महसूस किया, जिन पर उसका कोई नियंत्रण नहीं था।
भूकम्प आया तो उसे लगा कोई अदृश्य शक्ति धरती को हिला रही है। तूफ़ान उठा तो लगा कोई है जो उसे बना भी रहा है और अपनी इच्छा से शांत भी कर रहा है। सूनामी, आकाशीय बिजली, सूखा, अतिवृष्टि — ऐसी अनगिनत प्राकृतिक घटनाएँ थीं, जिनके सामने मनुष्य स्वयं को असहाय महसूस करता था।
यहीं से उसके भीतर यह विश्वास जन्म लेने लगा कि कोई ऐसी शक्ति अवश्य है, जो उससे अधिक शक्तिशाली है। उसी भावना से ईश्वर की अवधारणा ने जन्म लिया। फिर उसकी आराधना, अर्चना और आह्वान की परंपराएँ विकसित होने लगीं।
“खेड़ा” भी इसी मानवीय मनोविज्ञान और सामाजिक संरचना से जुड़ी एक अवधारणा है। खेड़ा एक प्रकार का काल्पनिक या प्रतीकात्मक रक्षक देव माना गया। जब पुराने समय में कबीले एक स्थान से दूसरे स्थान पर जाकर बसते थे, तब वे सबसे पहले किसी निश्चित स्थान पर ईंटों या मिट्टी से उस रक्षक देव की स्थापना करते थे। उसके बाद धीरे-धीरे वहाँ पूरा गाँव बसता था।
वह स्थान केवल पूजा का केंद्र नहीं होता था, बल्कि सामूहिक सुरक्षा, विश्वास और एकता का प्रतीक बन जाता था। गाँव में कोई नया व्यक्ति आता — चाहे वह नवजात शिशु हो, विवाह के बाद आने वाली दुल्हन हो, या कोई अन्य व्यक्ति जो पलायन करके उस गाँव में स्थायी रूप से बसना चाहता हो — वह खेड़ा देव को प्रणाम कर स्वयं को उस समुदाय का हिस्सा मानता था।
इस प्रकार खेड़ा केवल धार्मिक प्रतीक नहीं था, बल्कि सामुदायिक स्वीकृति और संरक्षण का प्रतीक भी था।
यह परंपरा आज भी अनेक गाँवों में जीवित है। इसके मूल में मनुष्य का उस शक्ति के प्रति समर्पण, सुरक्षा की चाह और सामूहिक विश्वास छिपा हुआ है, जिसे वह स्वयं से अधिक शक्तिशाली मानता आया है।
बनड़ा या बनड़ी को घर से बाहर जाने की मनाही — मटणा लगाना और तेल चढ़ाना
विवाह से पहले दूल्हे या दुल्हन को कुछ दिनों तक घर से बाहर न जाने देना, मटणा लगाना, तेल चढ़ाना जैसी रस्में आज भले केवल परंपरा या उत्सव का हिस्सा लगती हों, लेकिन इनके पीछे उस समय की जीवनशैली और व्यावहारिक समझ छिपी हुई थी।
पुराने समय में जीवन पूरी तरह कृषि आधारित था। खेतों में कठिन श्रम करना पड़ता था और धूप, मिट्टी तथा मौसम का सीधा प्रभाव शरीर और त्वचा पर पड़ता था। लगातार खुले वातावरण में काम करने से त्वचा पर टैनिंग, रूखापन और कई बार संक्रमण भी हो जाते थे।
ऐसे में विवाह जैसे बड़े उत्सव से पहले दूल्हे और दुल्हन को कुछ दिनों तक घर के भीतर या छाँव में रखा जाता था, ताकि शरीर को आराम मिले और त्वचा धूप से बची रहे। इसी दौरान उन पर हल्दी, तेल और विभिन्न जड़ी-बूटियों का मिश्रण लगाया जाता था। कई दिनों तक लगातार उबटन और तेल से मालिश कर नहलाने की प्रक्रिया चलती थी।
इससे खेतों की धूप से हुई टैनिंग कम होती, त्वचा मुलायम और कांतियुक्त बनती, और हल्दी अपने प्राकृतिक गुणों से त्वचा के संक्रमणों को भी दूर करती थी। हल्दी उस समय का प्राकृतिक एंटीसेप्टिक और सौंदर्य प्रसाधन दोनों थी।
तेल क्यों चढ़ाया और उतारा जाता है?
दूल्हा और दुल्हन की त्वचा में नमी बनाए रखने के लिए शरीर पर तेल लगाया जाता था। तेल की मालिश से शरीर को आराम मिलता था और त्वचा को पोषण मिलता था। परिवार की महिलाएँ बारी-बारी से यह कार्य करती थीं। यह केवल रस्म नहीं, बल्कि अपनापन और स्नेह का प्रतीक भी था।
तेल लगाने के बाद दही का प्रयोग उसकी अतिरिक्त चिकनाई को संतुलित करने के लिए किया जाता था। दही त्वचा को ठंडक देता था और उसे साफ व कोमल बनाता था। बालों को भी दही से धोया जाता था, जिससे वे मुलायम, स्वच्छ और चमकदार बनते थे।
आज जिस प्रकार लोग महंगे स्किन और हेयर ट्रीटमेंट करवाते हैं, उस समय यही घरेलू उपाय प्राकृतिक सौंदर्य प्रसाधन का कार्य करते थे। उस दौर में पानी की उपलब्धता भी सीमित थी। रोज़ स्नान करना हर किसी के लिए संभव नहीं था, इसलिए विवाह के अवसर पर दूल्हे को विशेष रूप से स्नान, मालिश और सजने-सँवरने का अवसर मिलता था। ऐसे में चेहरे पर चमक आना स्वाभाविक था।
फिर सुंदर वस्त्र, आभूषण और श्रृंगार दूल्हा-दुल्हन को सबसे अलग और आकर्षक बना देते थे। पूरे उत्सव का केंद्र वही होते थे। सबकी निगाहें उन्हीं पर टिकती थीं — ठीक वैसे ही जैसे आज किसी सेलिब्रिटी पर होती हैं।
स्वागत में दरवाजे पर तेल चढ़ाना, गाड़ी के टायर पर पानी डालना और तेल चढ़ाना
पुराने समय में बारातें मोटर कारों से नहीं, बल्कि बैलगाड़ियों, रथों और लकड़ी की मंझोलियों पर जाया करती थीं। उन गाड़ियों के पहिये भी लकड़ी के होते थे। लंबी यात्राओं के दौरान रास्ते की मिट्टी, कीचड़ और धूल पहियों में भर जाती थी। लगातार चलने से पहियों की धुरी में लगी चिकनाई भी समाप्त होने लगती थी।
उस दौर में यह एक सामान्य सामाजिक आचरण था कि मेहमान की गाड़ी के पहियों को पानी से धोया जाए और उसकी धुरी में तेल या चिकनाई डाली जाए। यह केवल सम्मान का प्रतीक नहीं था, बल्कि अतिथि की वास्तविक सहायता भी थी, ताकि उसकी वापसी की यात्रा सुगम हो सके।
धीरे-धीरे यही व्यवहार परंपरा बन गया। समय बदला, बैलगाड़ियों की जगह मोटर कारों ने ले ली, लेकिन सम्मान की वह भावना आज भी बनी हुई है। इसलिए आज भी विवाह में दूल्हे की कार के टायर पर पानी डालना और तेल लगाना उसी पुरानी परंपरा का आधुनिक रूप है।
पुराने समय में गाँव, कुनबे या बस्तियों के बड़े-बड़े मुख्य दरवाजे हुआ करते थे। वे भारी लकड़ी के बने होते थे और रोज़मर्रा में कम ही खोले जाते थे। जब कोई रथ, बैलगाड़ी या बड़ा वाहन भीतर आता, तभी वह मुख्य द्वार खोला जाता था। उसी बड़े दरवाजे में एक छोटा दरवाजा भी बना होता था, जिससे आम लोगों का आना-जाना होता था।
बड़े दरवाजे भारी होने के कारण उनकी चूलों और कुंडों में समय-समय पर तेल डालना आवश्यक होता था, ताकि वे आसानी से खुल-बंद हो सकें। विवाह के अवसर पर जब बारात के रथ और बैलगाड़ियाँ भीतर लाई जाती थीं, तब उस मुख्य द्वार की चूलों में तेल डाला जाता था।
आज भले ही वैसी विशाल चौपालें और किले जैसे दरवाजे नहीं रहे, लेकिन परंपरा अभी भी जीवित है। अब हम प्रतीक स्वरूप अपने घर के दरवाजे पर तेल चढ़ाते हैं और बिना जाने उस पुरानी सामाजिक स्मृति को निभाते चले आते हैं।
और हाँ, एक रोचक बात यह भी है कि हरियाणा में बैलगाड़ियों में तेल का प्रयोग बहुत बाद में शुरू हुआ। उससे पहले रथों और बैलगाड़ियों की धुरी पर पटसन — जिसे हरियाणा में “सण” कहा जाता है — उसके रेशों पर मक्खन लगाकर कई परतों में लपेटा जाता था। यही मक्खन पहियों की धुरी को पूरे सफर में चिकनाई देता था, ताकि पहिये आसानी से घूमते रहें।
यानी तेल आने से पहले हरियाणा में पहियों को भी मक्खन नसीब होता था। यही तो है असली “दूध-दही वाला हरियाणा”।
दुल्हे को सजा कर गाँव में क्यों घुमाया जाता है?
दूल्हे को सजा-धजाकर घोड़ी या रथ पर बैठाकर गाँव में घुमाने की परंपरा केवल उत्सव और दिखावे के लिए नहीं थी, बल्कि उसके पीछे गहरा सामाजिक उद्देश्य छिपा हुआ था।
पुरातन समय से ही विवाह केवल दो व्यक्तियों का निजी संबंध नहीं, बल्कि एक सामाजिक क्रिया माना जाता था, जिसमें पूरे समुदाय की उपस्थिति और भागीदारी आवश्यक होती थी। उस समय समाज सामूहिक जीवन पर आधारित था, इसलिए किसी भी विवाह को सामाजिक स्वीकृति मिलना महत्वपूर्ण माना जाता था।
बारात चढ़ने से एक दिन पहले दूल्हे को सजाकर गाँव की गलियों से होते हुए देव-पूजा या खेड़ा पूजा के लिए ले जाया जाता था। यह एक प्रकार की सार्वजनिक घोषणा होती थी कि अमुक युवक अब विवाह बंधन में बंधने जा रहा है।
इस परंपरा का उद्देश्य पूरे गाँव और समुदाय को यह जानकारी देना था कि अब इस युवक का रिश्ता सामाजिक रूप से स्वीकार किया जा रहा है। यह केवल परिवार का निर्णय नहीं, बल्कि पूरे समाज की जानकारी और सहमति से होने वाला संबंध माना जाता था।
गाँव के लोग दूल्हे को देखते, आशीर्वाद देते और विवाह उत्सव में अपनी सहभागिता सुनिश्चित करते थे। इस प्रक्रिया से सामाजिक संबंध मजबूत होते थे और विवाह केवल दो लोगों का नहीं, बल्कि दो परिवारों और पूरे समुदाय का उत्सव बन जाता था।
दूल्हा-दुल्हन पर नीम क्यों झारते हैं?
विवाह उत्सव में दूल्हा और दुल्हन दोनों ही यात्रा करके एक स्थान से दूसरे स्थान पर पहुँचते थे। पुराने समय में यह सफर पैदल, बैलगाड़ियों या रथों से लंबी दूरी तय करके किया जाता था। ऐसे सफर में वे अलग-अलग वातावरण, धूल-मिट्टी और अनेक लोगों के संपर्क में आते थे। स्वाभाविक रूप से जीवाणुओं और विषाणुओं के संपर्क में आने की संभावना भी बढ़ जाती थी।
इसी कारण दूल्हा और दुल्हन के स्वागत के समय नीम का प्रयोग किया जाता था। नीम की टहनियों को उनके ऊपर झारा जाता था, ताकि यह एक पारंपरिक संक्रमण-रोधी उपाय का कार्य करे।
भारतीय लोकजीवन में नीम को केवल एक पेड़ नहीं, बल्कि प्राकृतिक सुरक्षा कवच माना गया है। नीम में जीवाणुरोधी और वातावरण को शुद्ध रखने वाले गुण पाए जाते हैं। गाँवों में आज भी नीम को घरों, चौपालों और आँगनों के आसपास इसलिए लगाया जाता है, क्योंकि उसकी उपस्थिति वातावरण को स्वच्छ और सुरक्षित बनाए रखने में सहायक मानी जाती है।
विवाह जैसे बड़े सामूहिक आयोजनों में, जहाँ बाहर से अनेक लोग आते-जाते थे, वहाँ नीम का प्रयोग स्वास्थ्य सुरक्षा की लोक समझ का हिस्सा था। चाहे दूल्हे का स्वागत हो या नई दुल्हन का गृह प्रवेश — नीम की उपस्थिति को सुनिश्चित किया जाता था।
समय के साथ यह एक रस्म बन गई, लेकिन उसके मूल में लोक जीवन का स्वास्थ्य विज्ञान और प्राकृतिक उपचार की समझ छिपी हुई थी।
परंपराएँ बदलती हैं, प्रतीक रह जाते हैं
विवाह संस्कारों से जुड़े ऐसे अनेक विधान और लोकाचार हैं, जिन्हें हम अपने परिवारों और समाज में आज भी निभाते आ रहे हैं। कंगना खेलना, सांटे मारना, दुल्हन की गोद में देवर को बैठाना, दूल्हे की माँ द्वारा पानी वारना, मिणती करना और ऐसी न जाने कितनी रस्में हैं, जिनका संबंध कभी सामाजिक संरचना, पारिवारिक मनोविज्ञान, स्वास्थ्य, श्रम-विभाजन और लोकजीवन की व्यावहारिक समझ से रहा होगा।
समय के साथ उनके मूल कारण धुंधले पड़ गए, लेकिन रस्में आज भी जीवित हैं। कुछ परंपराएँ हमें भावुक करती हैं, कुछ मनोरंजक लगती हैं और कुछ ऐसी भी हैं, जो आज की दृष्टि से चौंकाती हैं।
इस एक लेख में सभी रस्मों और उनके पीछे छिपे अर्थों को समेट पाना संभव नहीं है, इसलिए उन्हें श्रृंखलाबद्ध लेखों में शामिल करूँगी।
बहरहाल, आप भी मुझे लिख भेजिए कि आपके यहाँ कौन-कौन सी ऐसी रस्में हैं, जो आपको सबसे अधिक रोचक, रहस्यमयी या चौंकाने वाली लगती हैं। मैं उन्हें आगे के लेखों में अवश्य शामिल करने का प्रयास करूँगी।
और हाँ, चलते-चलते एक ऐसी रस्म भी याद दिलाती हूँ, जो आज के समय में बहुत लोगों को अजीब या असहज लग सकती है। कुछ स्थानों पर दूल्हा बारात चढ़ने से पहले प्रतीकात्मक रूप से अपनी माँ के स्तन को होंठ लगाता है।
इस रस्म की जड़ें उस समय में हैं, जब बाल-विवाह सामान्य थे। उस दौर में बहुत कम उम्र के बच्चों का विवाह कर दिया जाता था। कई बार बच्चे वास्तव में अभी माँ का दूध पीने की अवस्था में ही होते थे और विवाह के बाद उन्हें माँ की गोद से विदा किया जाता था। समय बदला, बाल-विवाह कम हुए, दूल्हों की उम्र बढ़ी, लेकिन रस्म प्रतीकात्मक रूप में कई स्थानों पर बनी रही। आज भी कुछ जगहों पर वयस्क दूल्हे इस परंपरा को केवल सांकेतिक रूप में निभाते दिखाई दे जाते हैं।
यही परंपराओं की सबसे रोचक बात है — समय बदल जाता है, अर्थ बदल जाते हैं, लेकिन प्रतीक कई बार सदियों तक जीवित रहते हैं।
शेष अगली कड़ी में…

सुनीता धारीवाल





जीवन: अनुकरण नहीं, चयन - सोचिये क्या आप सही में वयस्क हैं



आप शायद वह युवती हैं जो अपने माता-पिता की हर बात बिना कोई सवाल किए मान लेती हैं। आपके आज्ञाकारी स्वभाव की हर ओर प्रशंसा होती है, लोग आपकी संस्कारी छवि के पुल बाँधते हैं।
या फिर आप वह युवती हैं जो हर बात में विरोध करती हैं, जिन्हें हर निर्णय और हर कार्य माता-पिता की इच्छा के विपरीत ही करना होता है।
लेकिन सच यह है कि इन दोनों ही स्थितियों में आपका संपूर्ण व्यक्तिगत विकास नहीं हो पाया है। आप अभी जीवन को गहराई से समझने और स्वतंत्र रूप से जीने के लिए पूरी तरह तैयार नहीं हैं। सामाजिक रूप से सक्षम होना केवल आज्ञाकारी या विद्रोही होने से संभव नहीं होता।
जीवन केवल “संस्कारी और आज्ञाकारी नारी”, “विद्रोही नारी” या “बेचारी नारी” की सीमाओं में नहीं बँधा है। एक सशक्त व्यक्तित्व इन सभी परिभाषाओं से परे होता है।
वास्तविक स्वतंत्र जीवन तब संभव होता है जब आप प्रशंसा और उपेक्षा — दोनों के जाल से मुक्त हों। जब आपके भीतर सवाल करने का साहस हो। जब आप हर “क्यों” का उत्तर खोजने की क्षमता रखती हों। क्योंकि परिपक्वता केवल आदेश मानने या विरोध करने में नहीं, बल्कि समझने, विचार करने और अपने विवेक से निर्णय लेने में होती है।
हर स्थिति और परिस्थिति को समझना, उसका निष्पक्ष आकलन करना और स्वयं किसी निष्कर्ष तक पहुँचना — यही एक स्वतंत्र व्यक्तित्व की पहचान है। अपने दृष्टिकोण को विकसित करना और उस पर विश्वास करना ही वास्तविक स्वतंत्रता का अनुभव कराता है।
जब हम किशोरावस्था से ही हर बात के पीछे के उद्देश्य को समझने और हर घटना का चारों ओर से विश्लेषण करने का अभ्यास करने लगते हैं, तब धीरे-धीरे हमारा व्यक्तित्व आत्मविश्वासी और स्वतंत्र बनने लगता है। यही अभ्यास हमें भीड़ की सोच से अलग अपनी समझ विकसित करना सिखाता है।
व्यस्क होने तक यह समझ हमारे भीतर एक ऐसे व्यक्तित्व का निर्माण करती है जो केवल दूसरों के निर्देशों पर नहीं चलता, बल्कि अपने विवेक, अनुभव और विचारों के आधार पर निर्णय लेना जानता है। क्योंकि हमारे फैसले ही हमारे जीवन की दशा और दिशा तय करते हैं। वे ही यह निर्धारित करते हैं कि हम परिस्थितियों के अनुसार बहेंगे या अपने जीवन का मार्ग स्वयं बनाएँगे।
यह भी समझना आवश्यक है कि मानव स्वभाव संग्रह करने वाला है — वस्तुओं का भी और इंसानों का भी। कोई औलाद के रूप में संजोता है, कोई मित्रों के रूप में, और कोई अपने प्रभाव क्षेत्र के रूप में। इंसान को दूसरे इंसान पर अधिपत्य स्थापित करने में एक प्रकार के आनंद की अनुभूति होती है। इससे व्यक्ति को स्वयं के शक्तिशाली होने का एहसास होता है। उस क्षण उसके भीतर सुख और संतुष्टि के रसायन सक्रिय होने लगते हैं, और फिर वह उसी स्थिति को बनाए रखने के लिए हर संभव प्रयास करता है — चाहे वह रिश्तों में हो, परिवार में, प्रेम में, मित्रता में या समाज में।
यदि ध्यान से अपने आसपास के संबंधों को देखें, तो पाएँगे कि कहीं न कहीं हर व्यक्ति किसी न किसी के प्रभाव में जी रहा है। ज़रा ठहरकर स्वयं से पूछिए — आपने अपने जीवन की लगाम किसे सौंप रखी है? माता-पिता को, पति को, मित्रों को, प्रशंसकों को, या फिर अपने विरोधियों को?
किसी के पीछे-पीछे चलते रहना, केवल स्वीकार किए जाने के लिए जीना, या दूसरों की स्वीकृति पर अपनी दिशा तय करना — यह विवेक नहीं है। यह उस हवा को महसूस करने से वंचित रह जाना है, जो केवल तब महसूस होती है जब आप स्वयं आगे चलना चुनते हैं।
स्वतंत्र जीवन का अर्थ अकेले हो जाना नहीं, बल्कि अपने निर्णय स्वयं लेने का साहस रखना है। अपने जीवन की लगाम अपने हाथ में होना, अपने फैसलों की जिम्मेदारी लेना, और उनके परिणामों का श्रेय या सीख — दोनों स्वयं स्वीकार करना ही वास्तविक परिपक्वता है।
क्योंकि अंततः आपका जीवन आपकी अपनी यात्रा है, और उसका मार्ग भी आपको ही तय करना है।
सुनीता धारीवाल 

रजोनिवृत्ति और स्त्री शरीर की बदलती गंध


स्त्री शरीर केवल मांस और रक्त का ढांचा नहीं होता, वह प्रकृति की एक सूक्ष्म और जीवंत रचना है। उसके भीतर होने वाले परिवर्तन केवल दिखाई नहीं देते, बल्कि महसूस भी किए जाते हैं। रजोनिवृत्ति अर्थात menopause ऐसी ही एक गहन जैविक प्रक्रिया है, जिसमें स्त्री का शरीर धीरे-धीरे एक नए संतुलन की ओर बढ़ता है। इस परिवर्तन के दौरान शरीर में अनेक सूक्ष्म बदलाव आते हैं — त्वचा, भावनाओं, नींद, ऊर्जा और यहाँ तक कि शरीर की प्राकृतिक गंध में भी।
अक्सर इस विषय पर खुलकर बात नहीं होती, लेकिन अनेक महिलाएँ यह अनुभव करती हैं कि रजोनिवृत्ति के बाद उनके शरीर की गंध बदलने लगती है। पसीने की गंध, त्वचा की महक, यहाँ तक कि मूत्र की गंध भी पहले जैसी नहीं रहती। कई बार यह गंध कुछ भारी, तीखी या पुरुषों जैसी प्रतीत होने लगती है। यह कोई भ्रम नहीं, बल्कि हार्मोन में आए बदलावों का स्वाभाविक परिणाम है।
युवावस्था में स्त्री शरीर में एस्ट्रोजन और अन्य प्रजनन हार्मोन सक्रिय रहते हैं। यही हार्मोन त्वचा की कोमलता, नमी और शरीर की उस विशिष्ट प्राकृतिक गंध को बनाए रखते हैं जिसे कई महिलाएँ एक मादक, सौम्य और स्त्रियोचित महक के रूप में अनुभव करती हैं। यह गंध इतनी स्वाभाविक होती है कि यौवन में हम उसे अलग से महसूस नहीं कर पाते, क्योंकि वह हमारे अस्तित्व का सहज हिस्सा बन चुकी होती है।
लेकिन जैसे-जैसे रजोनिवृत्ति की प्रक्रिया आरंभ होती है, हार्मोनल संतुलन बदलने लगता है। त्वचा शुष्क होने लगती है, पसीने की संरचना बदलती है, शरीर के बैक्टीरिया का संतुलन प्रभावित होता है और शरीर की रासायनिक प्रक्रिया भी धीरे-धीरे परिवर्तित होने लगती है। परिणामस्वरूप शरीर की प्राकृतिक गंध भी बदल जाती है। यह परिवर्तन अचानक नहीं आता, बल्कि वर्षों में धीरे-धीरे विकसित होता है।
यह अनुभव केवल शारीरिक नहीं, भावनात्मक भी होता है। कई महिलाएँ अपने भीतर एक अनकहा परिवर्तन महसूस करती हैं — जैसे शरीर अपनी पुरानी पहचान से आगे बढ़ रहा हो। यह परिवर्तन कभी असहज कर सकता है, तो कभी आत्मचिंतन का कारण बन जाता है। परंतु इसे किसी कमी या विकार की तरह देखने के बजाय जीवन के स्वाभाविक चरण के रूप में समझना अधिक आवश्यक है।
स्त्री का सौंदर्य केवल उसकी युवा देह या हार्मोनों में नहीं होता। हर आयु में उसका शरीर एक नई कहानी कहता है। रजोनिवृत्ति के बाद बदलती हुई गंध भी उसी कहानी का एक हिस्सा है — यह संकेत है कि शरीर एक नए अध्याय में प्रवेश कर रहा है।
हाँ, यदि गंध में अचानक बहुत अधिक परिवर्तन हो, तीव्र दुर्गंध, संक्रमण, जलन या अन्य असामान्य लक्षण हों, तो चिकित्सकीय सलाह लेना आवश्यक है। लेकिन सामान्य और धीरे-धीरे होने वाले परिवर्तन जीवन की स्वाभाविक जैविक यात्रा का हिस्सा हैं।
रजोनिवृत्ति अंत नहीं, बल्कि स्त्री शरीर का एक नया रूपांतरण है — शांत, परिपक्व और गहराई से भरा हुआ।
सुनीता धारीवाल 

शनिवार, 30 मई 2026

मृत्यु नहीं, महायात्रा

मृत्यु नहीं, महायात्रा
मनुष्य की जिज्ञासा ने उसे मंगल तक पहुँचा दिया है। जब हम बच्चे थे, तब जिज्ञासा होती थी कि बड़े होकर कैसे दिखेंगे, क्या बनेंगे। अब जब अधेड़ उम्र भी पार होने लगी है, तो मन में एक नया प्रश्न उठता है—हम कब और कैसे मरेंगे?
यह एक बड़ा रहस्य है। हम नहीं जानते कि हमारी मृत्यु कब, कहाँ और कैसे होगी। बस इतना तय है कि एक दिन जाना सबको है। पके फलों का गिरना उत्सव है, कच्चे फलों का गिरना मातम। और हम शायद अब पके और ज़्यादा पके के बीच कहीं खड़े हैं।
गिरना तो है, पर कब? अपना पूरा समय लेकर या किसी आंधी-तूफान के पहले ही झोंके में? यह कोई नहीं जानता।
स्वर्ग-नरक, हेवन-हेल, जन्नत-दोज़ख—इन धारणाओं पर मेरा विश्वास नहीं है। शायद इसी कारण मुझे मृत्यु से भय नहीं लगता। हाँ, कौतूहल अवश्य है। मुझे लगता है कि मृत्यु के बाद मैं इस विराट ब्रह्मांड के मूल तत्वों में विलीन हो जाऊँगी और मेरी कॉस्मिक यात्राएँ आरम्भ होंगी। मैं अलग-अलग आकाशगंगाओं और ब्रह्मांडों में पर्यटन करूँगी—बिना एक पैसा खर्च किए।
हम इसी ब्रह्मांड के तत्वों से बने हैं और अंततः वहीं लौट जाना है। खुशी-खुशी।
विज्ञान भी आज यही कहता है कि हमारे शरीर के अधिकांश परमाणु उन्हीं तारों के भीतर बने थे जिनसे ग्रह और आकाशगंगाएँ बनीं। कार्बन, ऑक्सीजन, नाइट्रोजन, कैल्शियम और फॉस्फोरस—ये सभी तत्व किसी समय तारों के हृदय में जन्मे थे। प्रसिद्ध खगोलशास्त्री कार्ल सगन ने कहा था—
"हम तारों की धूल से बने हैं।"
भारतीय दर्शन ने इसे सदियों पहले ही कह दिया था—"यथा पिंडे तथा ब्रह्माण्डे।"
मानव शरीर की राख और ग्रहों की धूल एक जैसी नहीं होती, पर दोनों के मूल तत्व एक ही ब्रह्मांडीय स्रोत से आते हैं। यह विचार मुझे आकर्षित करता है। शायद इसलिए कि इसमें अलगाव नहीं, एकत्व का बोध है।
मुझे ब्रह्मांड से प्रेम है। आसमान की ओर ताकना मेरा प्रिय शगल है। मैं घंटों तारों को निहार सकती हूँ। उनसे बातें करती हूँ। मुझे लगता है कि वे मेरी बातें सुनते हैं।
और एक दिन मैं भी उड़ते-बहते कणों में बदलकर इन्हीं के बीच चली जाऊँगी। अपने मूल में लौटने का विचार मुझे भय नहीं, उत्साह देता है। शरीर की यात्रा पूरी होगी तभी तो महायात्रा आरम्भ होगी।
मेरा यह मानना कि स्वर्ग-नरक जैसी कोई व्यवस्था नहीं है, मुझे मृत्यु के भय से मुक्त करता है। हम सूर्य-पूजक सभ्यता के लोग हैं। हमारे भीतर जो ऊर्जा का प्रकाश है, वह कभी मरता नहीं—बस रूप बदलता है।
इसलिए यहीं, इसी जीवन में, अच्छे कर्म करते चलो। बिना इस चिंता के कि यमराज के बही-खाते में दया, करुणा, दान और पुण्य दर्ज हो रहे हैं या नहीं। अच्छाई का मूल्य किसी परलोक के पुरस्कार में नहीं, बल्कि इसी जीवन की सार्थकता में है।
अरबों वर्षों से यह यात्रा चल रही है और आगे भी चलती रहेगी—निर्विघ्न, निरंतर।
बस जीवन का आनंद लो।
मौज लो, रोज़ लो। ना मिले तो खोज लो।

सुनीता धारीवाल

The Cosmic Homecoming


The Cosmic Homecoming
Reflections on Mortality, Stardust, and the Journey Back to the Universe
Human curiosity has carried us from caves to the Moon and onward to Mars. As children, our questions were simple and personal: What will I become? What will I look like when I grow up?
As the years pass and middle age slowly gives way to later life, a different question begins to emerge: When will I die, and how?
Death remains one of humanity's greatest mysteries. None of us knows when, where, or in what manner it will arrive. We know only that it will. The falling of ripe fruit is accepted as part of nature's rhythm; the falling of unripe fruit feels like a tragedy. Many of us, perhaps, now find ourselves somewhere between ripe and overripe.
Fall we must. The only uncertainty is whether we will complete our season or be carried away by the first gust of an unexpected storm.
Yet I do not fear death.
Not because I possess answers, but because I am fascinated by the mystery itself.
I do not believe in Heaven or Hell, Paradise or Damnation. For me, death is not a doorway to reward or punishment. It is a return—a homecoming. The thought brings not fear but curiosity. I imagine myself dissolving back into the vast fabric of the cosmos, becoming part of the same universe from which I emerged.
Perhaps then my greatest journey will begin.
I will travel among stars, galaxies, and worlds beyond imagination, not as a tourist carrying luggage, but as a fragment of the universe itself. No tickets. No passports. No expense. Only an endless voyage through existence.
After all, we are made from the elements of the universe, and one day we shall return to them.
Modern science has revealed something extraordinary. The atoms that form our bodies were forged in ancient stars billions of years ago. The carbon in our cells, the oxygen we breathe, the calcium in our bones, and the phosphorus that sustains life were all created in stellar furnaces long before Earth was born.
The astronomer Carl Sagan expressed it beautifully:
"We are made of star-stuff."
Long before telescopes and spectrographs confirmed this truth, Indian philosophy hinted at a similar understanding: as is the individual, so is the cosmos. The microcosm reflects the macrocosm.
Human ashes and cosmic dust are not chemically identical, yet they share a common ancestry. The elements that remain after our bodies return to the Earth were themselves born in dying stars and ancient explosions of unimaginable power.
I find this idea deeply comforting.
It tells us that we are not strangers in the universe. We belong to it.
I have always been fascinated by the night sky. Looking upward is one of my favorite occupations. I can spend hours watching the stars. Sometimes I speak to them. It may sound foolish, but I often feel that they are listening.
Perhaps they are.
One day I too will become part of that celestial conversation. I will drift as particles and energy among the same stars I have spent a lifetime admiring. The thought fills me not with sadness but with anticipation.
The journey of the body must end so that a greater journey may begin.
I come from a culture that has long revered the Sun. We have always understood, in one form or another, that energy does not truly disappear. It transforms. The light within us changes its shape but not its essence.
That belief frees me from the fear of death.
And so I try to live simply: to do good, to be kind, to offer compassion when I can—not because I imagine some celestial accountant recording my deeds in a cosmic ledger, but because goodness enriches life itself.
A meaningful life requires no promise of reward.
For billions of years, matter and energy have been traveling through the cosmos, continuously changing form. Stars become dust. Dust becomes planets. Planets give rise to life. Life reflects upon the stars from which it came.
And the journey continues.
Unbroken.
Eternal.
We are all participants in that magnificent voyage.
So enjoy life.
Take delight in ordinary days.
Find wonder in the sky above you and kindness in the people around you.
And if joy is not readily found, go searching for it.
For we have been travelers for billions of years, and our journey is far greater than we can imagine.
Death is not the end of the story.
It is simply the cosmic homecoming.
— Sunita Dhariwa

बुधवार, 29 जनवरी 2025

केंचुली से मित्रता कब तक ?


सुनो ...और एक दिन सांप भी केंचुली उतार देता है आगे बढ़ जाता है कितना गहरा अर्थ है इस में 
समय के साथ सांप की लंबाई बढ़ती है पर केंचुली की नहीं ।और केंचुली पर परजीवी अपना बसेरा करने लगते है सांप को संक्रमण होने लगता है  उसकी चाल रुकने लगती हूं वो छटपटाता है  सांप परेशान होता है वह केंचुली को अपने दांतों से रगड़ कर उतारने लगता है वे पेड़ो से घिसता है खुद को ..पत्थरों से घिसता है खुद को और वह केंचुली उतार देता है वहीं छोड़ आगे बढ़ जाता है ।
भले मनुष्य अतीत की केंचुली साथ लिए फिरेंगे तो आगे चलेंगे कैसे नई त्वचा का आनंद ले ही नहीं सकेंगे । पुरानी केंचुली चिपकाए हम छटपटा रहे है घुट रहे हैं ये केंचुली अतीत की गलतियां है गुनाह है असफलताएं है पश्चाताप है आत्म ग्लानि हैं और हम इन्हें हम अपनी पीठ पर लादे हुए सरकने की कोशिश कर रहे है हमारी चमकती बलखाती देह  की स्पीड हम भूल गए हैं बस केंचुली की जड़कन में तने हुए इंतजार कर रहे है कि घुटन से तो अच्छा है जग से चले जाएं ।कोई हमारी केंचुली उतारने नहीं आएगा । लोग बेचारा कह कर आगे चल देंगे ।हमने अपने दांतों से खुद ही अपनी केंचुली पर प्रहार करना है बार बार करना है तोड़ना है इसे पत्थरों से पेड़ो से रगड़ना है जमीन पर लोट लोट कर इसको तोड़ना है खुद ही तब ही हम मुक्त होंगे तमाम तरह से परजीवियों से संक्रमणों से बोझ से।वक्त लगेगा पर केंचुली उतर जाएगी ।तंग रास्तों पर चलें ऊबड़ खाबड़ पर चलें कांटो में चले तो यह केंचुली जल्दी उतर जाएगी । फिर मिलेगी ताजी हवा ताजी त्वचा को और फिर घुटन नहीं होगी ।बस बोझ जो लिए फिरते हो उतार दो ।हल्के हो जाओ ।दौड़ने लगोगे ।चमकदार शीशे की तरह चमक दोबारा मिलेगी ।
समझ गए होंगे सब 
चलो अब सांप के बारे में जान लो 


सांप अपनी त्वचा यानी केंचुली उतारता है क्योंकि उसकी त्वचा उससे साथ नहीं बढ़ती. सांप की त्वचा खराब होने पर, या जब उस पर परजीवी लग जाते हैं, तब वह केंचुली उतारता है. सांप की केंचुली उतारने की प्रक्रिया को इक्डीसिस कहते हैं. 
सांप केंचुली उतारने के कारण: 
सांप की त्वचा खराब हो जाती है.
सांप के शरीर पर परजीवी लग जाते हैं.
सांप के शरीर का विकास होता है.
सांप को संक्रमण से मुक्ति मिलती है.
सांप केंचुली उतारने का तरीका:
सांप अपने जबड़ों की मदद से केंचुली उतारता है. 
सांप जंगल में चट्टानों, पेड़ों के ठूंठों, या पौधों के मज़बूत तने से अपने शरीर को रगड़ता है. 
सांप पानी के पास जाता है और केंचुली उतारता है. 
सांप की केंचुली से जुड़ी कुछ और बातें:
सांप की केंचुली का इस्तेमाल कई तरह की दवाओं और दवाओं की रिसर्च में किया जाता है. 
मध्य प्रदेश की कुछ जनजातियां चर्म रोगों में सांप की केंचुली का इस्तेमाल करती हैं. और भी बहुत उपयोग हैं सांप की केंचुली के फिर कभी और जिक्र करेंगे 


सुनीता धारीवाल 

"केंचुली उतारो, नया जीवन पाओ"

सांप की केंचुली, जीवन दर्शन, आत्म-मुक्ति, अतीत का बोझ, बदलाव, नया जीवन, प्रेरणादायक विचार, आत्म-परिवर्तन, संघर्ष, मानसिक शुद्धि, आत्म-सुधार

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मंगलवार, 21 जनवरी 2025

सुबह की पहली किरण: क्या करते है विभिन्न देशों के लोग क्या होती है उनकी प्रातः की दिनचर्या ?

सुबह की पहली किरण: अलग-अलग देशों की खास सुबह की परंपराएं Morning stories 



सुबह का समय हर किसी के जीवन में बेहद खास होता है। यह दिन की शुरुआत करने और सकारात्मक ऊर्जा पाने का अवसर है। हर देश की सुबह की अपनी एक अनूठी कहानी है, जो उनकी परंपराओं, संस्कृति और जीवनशैली को दर्शाती है। आइए, दुनिया के अलग-अलग देशों की सुबह की पहली गतिविधियों पर नज़र डालते हैं और देखते हैं कि यह कैसे उनके जीवन को रंगीन बनाती है।


1. भारत: आध्यात्मिकता से भरी सुबह

भारत की सुबह अक्सर प्रार्थना, ध्यान और योग से शुरू होती है। गुनगुनी चाय या मसाला चाय के साथ दिन की शुरुआत करना भारतीयों का पसंदीदा है। गांवों में लोग सुबह जल्दी उठकर खेतों में काम करते हैं या पशुओं की देखभाल करते हैं। भारत की सुबह आध्यात्मिकता और कड़ी मेहनत का संगम है।

2. जापान: सादगी और अनुशासन का मेल

जापान में सुबह का समय सादगी और अनुशासन का प्रतीक है। लोग ग्रीन टी के साथ हल्के स्ट्रेचिंग या "राजियो तैसो" (रेडियो एक्सरसाइज) करते हैं। घर को साफ-सुथरा करना और पारंपरिक नाश्ता तैयार करना जापानी जीवनशैली का हिस्सा है।

3. अमेरिका: भागदौड़ और कैफीन की शुरुआत

अमेरिका की सुबह तेजी और कैफीन से भरी होती है। कॉफी के कप के साथ लोग ईमेल चेक करते हैं या ताजा खबरें पढ़ते हैं। काम पर जाने से पहले वर्कआउट और हल्का नाश्ता भी सुबह की दिनचर्या में शामिल है।


4. फ्रांस: धीरे-धीरे जीवन का आनंद

फ्रांस की सुबह शांत और आरामदायक होती है। लोग एक कप कॉफी और क्रोइसेंट या जैम के साथ बगेट का आनंद लेते हैं। घर पर या किसी कैफे में बैठकर इस नाश्ते का स्वाद लेना फ्रेंच लाइफस्टाइल का हिस्सा है।


5. चीन: प्रकृति और सेहत का संगम

चीन में सुबह अक्सर ताई ची या पार्क में सैर से शुरू होती है। यह न केवल फिटनेस के लिए अच्छा है बल्कि प्रकृति से जुड़ने का भी तरीका है। इसके बाद पारंपरिक नाश्ता जैसे कॉन्जी या स्टीम्ड बन्स लिया जाता है।

6. मैक्सिको: मसालों और परंपराओं की सुबह

मैक्सिको में सुबह का नाश्ता जीवंत और स्वादिष्ट होता है। "कैफे डी ओल्ला" (दालचीनी के साथ मसालेदार कॉफी) और चिलाक्विल्स या टैमालेस जैसे पारंपरिक व्यंजन सुबह का हिस्सा हैं। यह एक रंगीन और उत्साह से भरी शुरुआत होती है।

7. ऑस्ट्रेलिया: प्रकृति से जुड़ी शुरुआत

ऑस्ट्रेलियाई सुबहें अक्सर हेल्दी होती हैं। टोस्ट और एवोकाडो या ताजे फलों के साथ चाय या कॉफी लेना आम बात है। कुछ लोग सर्फिंग या सुबह की दौड़ जैसी बाहरी गतिविधियों से दिन की शुरुआत करते हैं।

8. जर्मनी: भरपेट नाश्ता और तैयारी का समय

जर्मनी में सुबह का नाश्ता खासा भरपूर होता है। ब्रेड, चीज़, ठंडी कटिंग और चाय या कॉफी के साथ लोग खुद को पूरे दिन के लिए तैयार करते हैं। यह एक संतुलित और व्यवस्थित शुरुआत है।

9. मध्य पूर्व: परंपरा और विश्वास का संगम

मध्य पूर्व में सुबह की शुरुआत चाय या अरबी कॉफी के साथ होती है। फ्लैटब्रेड, चीज़ और बीन्स जैसे नाश्ते के साथ सुबह की नमाज (फज्र) महत्वपूर्ण होती है। यह आध्यात्मिकता और परंपराओं को दर्शाता है।

10. रूस: ठंड में गर्माहट

रूस में सुबहें कड़क सर्दियों में गर्म नाश्ते से शुरू होती हैं। काशा (दलिया) और चाय का आनंद लिया जाता है। कुछ लोग सर्द मौसम में सुबह की सैर भी करते हैं, जो उनके दृढ़ और साहसी स्वभाव को दर्शाता है।

11. स्कैंडिनेविया: प्रकृति और स्वास्थ का संतुलन

स्वीडन और नॉर्वे जैसे स्कैंडिनेवियाई देशों में लोग सुबह की शुरुआत राई ब्रेड, बेरीज़ और दही जैसे हेल्दी नाश्ते से करते हैं। सर्दियों में, सुबह के समय सॉना का भी आनंद लिया जाता है, जो उन्हें दिन भर तरोताजा रखता है।

12. इटली: जल्दबाजी में स्वाद का आनंद

इटली में सुबहें अक्सर एक कप एस्प्रेसो या कैपुचिनो और पेस्ट्री के साथ बार काउंटर पर बिताई जाती हैं। यह तेज़ लेकिन स्वादिष्ट शुरुआत इटालियंस की जीवनशैली का हिस्सा है।

सुबह का जादू

हर देश की सुबह की परंपराएं उनके इतिहास, मौसम और संस्कृति से गहराई से जुड़ी होती हैं। चाहे यह भारत की प्रार्थनाओं से शुरू हो, जापान के अनुशासन से या फ्रांस की शांति से, हर सुबह जीवन को एक नया आयाम देती है।

आपकी सुबह कैसी होती है? क्या यह किसी देश की सुबह से मेल खाती है, या इसमें आपका अपना अनोखा अंदाज है? अपनी सुबह को खास बनाइए और इसे एक नई शुरुआत के रूप में अपनाइए!


Morning Stories: Unique Mornings from Around the World

Mornings are the most special time of the day. They bring new opportunities, fresh energy, and a chance to set the tone for the hours ahead. Every country has its own way of embracing the morning, reflecting its culture, traditions, and lifestyle. Let’s explore the fascinating morning routines from around the world and see how people start their day.


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1. India: A Blend of Yoga, Tea, and Spirituality

Mornings in India are often steeped in spirituality. Some start their day with temple bells and prayers, while others practice yoga and meditation to gather their energy. A warm cup of chai with a newspaper is a staple for many. In rural areas, mornings begin with tending to fields or livestock, showcasing a deep connection to nature.


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2. Japan: Simplicity and Discipline

Japanese mornings are a perfect blend of simplicity and discipline. Many people engage in "rajio taiso" (radio calisthenics) to refresh their body and mind. The day often begins with a cup of green tea and a light, nutritious breakfast. Cleanliness and order are key elements of Japanese life, even in the early hours.


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3. USA: Coffee and Digital Routines

Mornings in the United States are often fueled by caffeine. A steaming cup of coffee is the first step for many, followed by checking emails or catching up on the latest news. Fitness enthusiasts fit in a quick gym session or a brisk run before diving into their busy schedules.


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4. France: Slow and Relaxed Starts

In France, mornings are an art form. A cup of coffee paired with a buttery croissant or a fresh baguette topped with jam is the quintessential French breakfast. This leisurely routine is often enjoyed at home or at a charming café, where the focus is on savoring the moment rather than rushing through it.


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5. China: A Harmony of Nature and Health

Mornings in China are deeply rooted in tradition. Many start their day with tai chi or a gentle walk in the park, connecting with nature while rejuvenating their bodies. A typical breakfast includes congee (rice porridge) or steamed buns, offering a healthy and comforting start to the day.


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6. Mexico: Flavorful and Lively Beginnings

In Mexico, mornings are full of vibrant flavors. A spiced cup of “café de olla” (coffee infused with cinnamon) is paired with traditional dishes like tamales or chilaquiles. This hearty breakfast sets the tone for a day filled with energy and color.


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7. Australia: Outdoor Adventures and Health

Australian mornings often begin with a healthy breakfast of avocado toast or cereal accompanied by tea or coffee. Many people head outdoors for a jog, a swim, or even surfing, embracing the country’s love for nature and fitness.


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8. Germany: A Hearty and Organized Start

Germany’s mornings are all about preparation and nourishment. A typical breakfast includes fresh bread, cheese, cold cuts, and coffee or tea. The structured and fulfilling start reflects the organized lifestyle Germans are known for.


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9. Middle East: Tradition and Faith

In the Middle East, mornings start with a strong cup of tea or Arabic coffee, often accompanied by flatbread, cheese, or beans. For many, the day begins with Fajr (the pre-dawn prayer), grounding them spiritually before tackling the day ahead.


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10. Russia: Warmth in the Cold

Russian mornings are designed to combat the cold with warmth. A hot bowl of kasha (porridge) or eggs served with tea is the preferred breakfast. In colder months, some start their day with a brisk walk, highlighting their resilience and love for their surroundings.


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11. Scandinavia: Balance and Simplicity

Mornings in Scandinavia are simple yet wholesome. A typical breakfast includes rye bread, cheese, or yogurt topped with fresh berries. In the winter months, many enjoy a quick sauna session to energize themselves for the day ahead.


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12. Italy: Quick but Delightful

Italians prefer a quick yet delightful start to their day. A shot of espresso or a creamy cappuccino paired with a pastry is enjoyed standing at a café counter. It’s a short but flavorful tradition that speaks to Italy’s love for good food and coffee.


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The Magic of Mornings

Every country’s morning routine is a reflection of its culture, climate, and values. Whether it’s the spiritual calmness of India, the disciplined start in Japan, or the leisurely charm of France, mornings are a beautiful way to connect with the essence of life.

How do you start your day? Does your morning resemble any of these traditions, or is it uniquely your own? Embrace your mornings and make them as special as they are meant to be!



रुको मत बस दौड़ते रहो



यह दुनिया एक विशाल रेस ट्रैक है, जहाँ हर कोई अपनी मंज़िल की ओर भाग रहा है। कोई किसी के लिए रुकता नहीं, न ही यह देखता है कि कौन गिरा, कौन ठहरा, या कौन लड़खड़ा रहा है। हर इंसान अपनी ही मंज़िल पर ध्यान केंद्रित किए हुए है।जब हम इस दौड़ में गिरते हैं, तो हमें अपने भीतर से हिम्मत जुटानी होती है, फिर से खड़ा होना होता है, और आगे बढ़ना होता है। गिरना अंत नहीं है, यह तो हमारे साहस और दृढ़ता का इम्तिहान है।लेकिन याद रखें, हर दौड़ का एक अंत होता है। कुछ लोग आधे रास्ते में रुक जाते हैं, कुछ मंज़िल से पहले, और कुछ मंज़िल तक पहुँचकर। लेकिन अंततः हर दौड़ समाप्त होती है। असली मायने इस बात के हैं कि हमने अपनी यात्रा को कितनी हिम्मत और जुनून से पूरा किया।अपनी दौड़ को उद्देश्यपूर्ण बनाएं, और हर कदम को मायने दें।@sd This world is like a vast racetrack, where everyone is running, driven by their own goals and aspirations. No one pauses, no one looks back to see who has stumbled, who has fallen, or who is struggling to keep up. Each soul is focused on their own finish line.When we fall on this relentless track, it’s up to us to summon the courage within, to rise again, and take those first steps forward. The journey doesn’t end with a fall—it continues with resilience, strength, and determination.But remember, every race has its end. Some will halt midway, some before reaching the finish line, and others right at it. Yet, the truth remains: every race concludes. What truly matters is not how far we ran, but how courageously we faced the journey.Keep running your race with purpose, and make every step count.@SdSuneeta Dhariwal Jangid

गुरुवार, 17 मार्च 2022

सी डैक मोहाली ने मनाया महिला दिवस -लैंगिक भेदभाव पर हुई चर्चा

अंतरष्ट्रीय महिला दिवस के सप्ताह पूर्व से सप्ताह पश्चात तक आयोजनों का सिलसिला अभी थमा नही है बीते  9 मार्च को भारत सरकार के इलेक्ट्रॉनिकस सूचना एवं प्रौद्योगिकी मंत्रालय  द्वारा संचालित प्रगत संगणन विकास केंद्र मोहाली (सी डैक)  द्वारा महिला दिवस मनाते हुए  महिला अधिकारियों व कर्मचारियों के लिए विशेष चिंतन व जागरुकता स्त्र  का  आयोजन किया गया ।जिस में वरिष्ठ समाजिक चिंतक व प्रोत्साहक श्रीमती सुनीता धारीवाल ने मुख्य अतिथि के रूप में उपस्तिथ हुई।कार्यक्रम के आरंभ में सी डैक मोहाली के कार्यकारी निदेशक डॉ प्रवीण कुमार खोसला ने सभी को महिला दिवस की बधाई दी और कहा कि आज हर क्षेत्र में महिलाओं ने अपनी प्रतिभा का लोहा मनवाया है ।और अब तो शायद ही कोई क्षेत्र ऐसा हो जहां महिलाओं ने अपना दमखम नही दिखाया है ।प्रवीण खोसला ने एक और महत्वपूर्ण बात कही कि  उच्च प्रशासनिक स्तर के निर्णयों में महिला अधिकारी  हमें  उस दृष्टिकोण से परिचित करवाती हैं जिस के बारे में अधिकतर पुरुष या तो अनभिज्ञ होते हैं या अधिक मान्यता नही देते हैं । निर्णय लेने की भूमिका में महिला अधिकारियोँ की भागीदारी फैसलों को अधिक मानवीय बनाती है ।
भारत मे  इलेक्ट्रॉनिक्स ,सूचना प्रद्योगिकी एवं विज्ञान के सभी क्षेत्रों में महिलाओं की सँख्या उत्साहजनक है ।उन्होंने मुख्य अतिथि  श्रीमती सुनीता धारीवाल का औपचरिक अभिनन्दन कर वक्तव्य के लिए आमंत्रित किया ।
सुनीता धारीवाल ने अपने वक्तव्य में कहा भारतीय महिलाओं ने तमाम विश्व की महिलाओं की तुलना बहुत कम समय में समाज मे अपनी जगह बनाई है ।आज का दौर महिलाओं के लिए उत्सव का दौर है जिस में हम चारों तरफ महिलाओं की उप्लब्धियों का जश्न मनाते हुए आगे बढ़ रहे हैं ।परंतु महिलाओं के सामने आज भी चुनौतियां है समाज की अनेक तहों में अनेक प्रकार की समस्याओं से आज भी महिलाएं जूझ रही है ।शिक्षा और स्वास्थ्य अभी भी अपने लक्ष्य नही छू पाया है ।महिलाओं के प्रति समाज की मानसिकता में परिवर्तन तो आया है पर एक वर्ग तक ही सीमित है जिस में शिक्षा के कारण सोच बदली है  महिलाओं के प्रति सदियों से चली आ रही धारणाओं में बदलाव जरूर आया है महिलाओं की स्वीकार्यता भी  बढ़ी है । गैंगरेप ,घरेलूं हिंसा ,यौन उत्पीड़न ,मानव तस्करी के  मामलों में ज्यादा कमी नजर नही आती है ।
महिलाओं को अवसर देने के लिए अनुकूल सामाजिक माहौल बनाने की भी जरूरत होती है।यह सबकी सामाजिक जिम्मेदारी है ।और हर किसी को जागरुक होने की जरूरत होगी ।आर्थिक और राजनैतिक नेतृत्व की दिशा में अभी अनेक खाइयों को लांघना बाकी है ।
कार्यक्रम में सी डैक की महिला अधिकारी उपस्थित रहीं और उन्होंने ने भी अपने विचार साँझे किये ।

शुक्रवार, 11 मार्च 2022

अंकित धारीवाल मेमोरियल ट्रस्ट द्वारा  महिलाओं को डिजिटल दुनिया से जोड़ने और उन्हें सूचना एवं प्रसारण के क्षेत्र में सबल बनाने हेतु चलाई जा रही वीमेन टीवी इंडिया नेटवर्क परियोजना के बैनर तले  स्नातकोत्तर महिला  राजकीय महाविद्यालय सेक्टर 11 चंडीगढ ,राजकीय स्नातक शिक्षा महाविद्यालय सेक्टर 20 चंडीगढ़ ,एवम यूनिवर्सिटी कालेज चुन्नी कलां ,फतेहगढ़ साहिब पंजाब के सहयोग से अंतराष्ट्रीय महिला दिवस पर राष्ट्रीय परिचर्चा का ऑनलाइन आयोजन किया गया जिस में लैंगिक समानता की जरूरत विषय पर अनुभवी वक्ताओं ने अपने विचार सांझा किये  ।इस कार्यक्रम में हरियाणा के पूर्व अतिरिक्त पुलिस महानिदेशक राजबीर देसवाल आईपीएस ने मुख्य अतिथि के रूप में शामिल हुए एवम वरिष्ठ शिक्षविद प्रोफेसर डॉ अनिता कौशल विशिष्ठ अतिथि के तौर पर शामिल हुई और प्रतिभगियों का हौंसला बढ़ाया ।कार्यक्रम की शुरुआत में वीमेन टीवी इंडिया वेब पोर्टल की एडिटर मीनाक्षी चौधरी ने वीमेन टीवी  परियोजना के उद्देश्यों के  बारे में बताया । अंकित धारीवाल मेमोरियल ट्रस्ट की अध्यक्षा विभाति पढियारी ने मुख्य अतिथि ,विशिष्ठ अतिथी , प्रतिभगियों ,वक्ताओं,सहयोगी शिक्षण संस्थानों  और श्रोताओं का  औपचारिक अभिनन्दन किया और ट्रस्ट द्वारा चलाई जा रही परियोजनाओं के बारे में जानकारी देते हुये बताया कि "मंगला"  किशोरी स्वास्थ्य कार्यक्रम, "बाल सखा "बाल यौन उत्पीड़न की रोकथाम के प्रति जागरुक्ता कार्यक्रम , " वर्कप्लेस यूफोरिया "कार्यस्थलों पर महिलाओं के यौन उत्पीड़न की रोकथाम के लिए जागरुकता एवम  शिकायत निवारण समितियों के गठन और क्षमता वर्धन हेतु प्रशिक्षण कार्यक्रम ,और वीमेन टीवी इंडिया नेटवर्क परियोजना के अंतर्गत महिलाओ को डिजिटल दुनिया से जोड़ कर उन्हें डिजिटल शिक्षित किया जा रहा है व उनकी क्षमताओं को प्रशिक्षण द्वारा बढ़ाया जा रहा है ।यह डिजिटल स्थान महिलाओं को अपनी आवाज उठाने और प्रतिभा को प्रदर्शित करने का अवसर देता है जिसका उद्देश्य सही और जिम्मेदार  सूचना का प्रसारण करना है ।
इसके बाद कार्यक्रम के संचालन की बागडोर वीमेन टीवी इंडिया नेटवर्क से जुड़ी प्रतिभशाली काउंसलर विनीत दुआ ने संभाली और परिचर्चा का बड़ी खूबसूरती और प्रभावशाली ढंग से संचालन किया ।
सबसे पहले हैदराबाद निवासी कॉर्पोरेट ट्रेनर प्रेमसाई समन्त्राय ने अपने विचार रखे और बताया कि आने वाला समाज लिंग भेद को खत्म कर समानता पर लाना है तो हमें उसकी तैयारी करनी होगी ।स्त्री पुरुष व मिश्रित व अलिंगी नागरिकों के लिए किस तरह  से नए शब्दों को गढ़ने की जरूरत होगी और किस तरह नई भौतिक सुविधाओं की जरूरत पड़ेगी ।हमे धीरे धीरे इन सब में भी परिवर्तन लाने होंगे ।
इसके बाद सुप्रसिद्ध लेखक ,प्रबन्धन विशेषज्ञ  कर्नल 
दलजीत चीमा ने अपने विचार रखे ।

अगली वक्ता वरिष्ठ पत्रकार रेणु सूद सिन्हा ने अपने विचार रखते हुए  कहा कि 

कार्यक्रम की विशिष्ट अतिथि प्रोफेसर डॉ अनिता कौशल ने अपने संबोधन में अभिव्यक्त किया कि 

 इसके बाद परिचर्चा का दौर शुरू हुआ जिसे विनीत दुआ ने सहयोगी कालेज की एन एस एस इंचार्ज प्रोफेसर  ने भाग लिया ।एसोसिएट प्रोफेसर डॉ रवनीत चावला  ,यूनिवर्सिटी कालेज की एन एस एस इंचार्ज असिस्टेन्ट प्रोफेसर डॉ गीत लांबा और वीमेन टीवी इंडिया की निदेशक पूर्व प्रोफेसर  रजनी भल्ला ने भी परिचर्चा में भाग ले कर चर्चा को सार्थकता प्रदान की ।
कार्यक्रम के मुख्य अतिथि  पुलिस प्रशासनिक अधिकारी   राजबीर देसवाल ने अपने संबोधन में कहा कि ...
लगभग दो घण्टे चले इस कार्यक्रम में  मुख्य अतिथि राजबीर देसवाल ने चर्चा में सक्रियता बनाये रखी और सभी को ध्यान से सुना और त्वरित  टिप्पणी से कार्यक्रम को जीवंत बनाये रखा ।
इस कार्यक्रम के आयोजन में पी जी जी जी सी सेक्टर 11 चंडीगढ की जेंडर कमेटी की इन्चार्ज डॉ कमल प्रीत ने भी लगातार  सहयोग दिया ।और छात्राओं को इस आयोजन में भाग लेने के लिए प्रेरित किया ।
कार्यक्रम को सफल बनाने के लिए वीमेन टीवी से जुड़ी सदस्य महिलाओं ने सहयोग किया और कार्यक्रम में उपस्थिति दर्ज करवाई ।तीनो सहयोगी कालेज के छात्रों के अतिरिक्त वीमेन टीवी टीम के सदस्य डॉ मंजू अरोड़ा ,जसपाल कौर ,शशि कालिया ,नंदिनी , अस्तिन्दर कौर ,स्नेह विज ,उर्मिल बजाज ,एवम अन्य सदस्यों ने भाग लिया ।

शनिवार, 29 जनवरी 2022

पंजाब प्रदेश की लोक गायिका श्रीमती गुरमीत बावा को मरणोपरांत पदम श्री से नवाजा गया है गुरमीत बावा को लम्बी हेक की मलिका के रूप में प्रसिद्धि मिली







भारत के पंजाब प्रदेश की लोक गायिका श्रीमती गुरमीत बावा को मरणोपरांत पदम श्री से नवाजा गया है गुरमीत बावा को लम्बी हेक की मलिका के रूप में प्रसिद्धि मिली ।वे लगभग 45 सेकंड तक लम्बा आलाप ले कर अपने गायन की शुरुआत करती थी उनका यही अंदाज उन्हें अपने समकालीन गायकों से अलग करता था । उनका ठेठ देसी पंजाबी लहजा और पारम्परिक अंदाज में गायकी ने लोगों को दशकों तक दीवाना बनाये रखा ।
गुरमीत बावा दूरदर्शन पर गाने वाली पहली गायिका बनी थी । जब गुरमीत बावा की मां का देहांत हुआ तब वे मात्र 2 वर्ष की थी पढ़ाई लिखाई के संकल्प ने उन्हें उस क्षेत्र की पहली टीचर होने का गौरव दिलाया ।जब लड़कियों की स्कूली शिक्षा प्रचलन ने नही तब गुरमीत ने जूनियर बेसिक टीचर की पढ़ाई कर ली थी ।
वे शौकिया गाती थी और बाद में व्यवसायिक गायिका बनी ।वे  तुम्बी  ,चिमटा ढोलकी , अल्गोजा जैसे पारंपरिक वाद्यों से संगत कर गाती थी ।उनके इस लोक रंग में  गाने के अंदाज ने न केवल लोक साजों को अंतरराष्ट्रीय मिली बल्कि भारतीय महिलाओं को भी पहचान मिली ।रूस ,लीबिया ,बैंकाक,थाईलैंड ,जापान सहित अनेक देशों में उन्होंने लोक गीत गाये और भारत की  लोक संस्कृति का प्रतिनिधित्व किया ।
उन्हें पूर्व में पंजाब सरकार  राज्य पुरस्कार ,शिरोमणि गायिका ,संगीत नाटक अकादमी द्वारा राष्ट्रपति पुरस्कार से भी सम्मानित किया जा चुका है इस बार पदम् श्री पुरस्कार दिया गया है ।
फरवरी 18 1944 में गुरमीत बावा का जन्म अविभाजित भारत के गांव कोठे जिला गुरदासपुर में हुआ था  पिछले वर्ष 21 नवम्बर 2021  को अमृतसर में देहांत हुआ । बीते दिनों उनके परिवार के सदस्यों ने सरकार द्वारा गुरमीत बावा की अनदेखी की बात सोशल मीडिया साक्षात्कारों में भी उठाई थी और पदम् श्री दिए जाने की मांग की थी । उन्हें  रोष  था ऐसी कलाकार जिस ने सारी उम्र लोक विरासत को सहेजने और सवांरने में लगाई हो सरकार द्वारा उन्हें  पदम् पुरस्कारों लायक नही समझा गया ।
पर अब जब उन्हें यह पुरस्कार दिया जाना है तो वह इस दुनिया मे नही हैं ।
 गुरमीत बावा को बधाई वे जहां है वहां तक यह सलाम पँहुचे ।

शुक्रवार, 14 जनवरी 2022

भारत मे अवैध संबंध के कारण तलाक इतने नही हुए होंगे जितनी हत्याएं और आत्म हत्याएं होती है ।क्यों लोग भटक जाते हैं क्यों पनप जाते है अवैध रिश्ते और क्या होता है असर कैसे समझें इस समस्या को ?


 महिलाओं के एक स्थानीय क्लब ने अभी कुछ रोज पहले मुझे अपनी वार्षिक बैठक की अध्यक्षता करने के लिए बुलाया।बढ़िया कार्यक्रम था मेरा बहुत मान सम्मान किया - हर बार की तरह अपने उद्बोधन में मैंने महिलाओं से कहा कि कोई ऐसी बात जो आप किसी से न कह पाई हों आप मुझ से निसंकोच अकेले में कह सकती हैं।हो सकता है मैं आपकी  समस्या का कोई हल बता पाऊं और अधिक से अधिक यह होगा कि आपका मन हल्का होगा और गोपनीयता भी बनी रहेगी ।
कोई भी स्त्री मेरे पास नही आई सब बोली कि वे खुश हैं उन्हें कोई समस्या नही है चलो जी कार्यक्रम खत्म हुआ और सब चल दी मैं अपनी गाड़ी की तरफ गई और गाड़ी में बैठने लगी तो पीछे से आवाज आई दीदी रुको एक मिनट ।मैंने गाड़ी का शीशा खोला और उसकी तरफ देखा उस ने अपनी शॉल उतार दी और बोली दीदी मुझे ध्यान से देखो वह घूम गई । दीदी मुझे  सर से पांव तक देखो और मुझ में बताओ मुझ में क्या कमी है मैं एम ए पास हूँ दो बेटे हैं मेरे ।लम्बे बाल है मेरे रंग भी गोरा है आप बताओ मुझ में कमी क्या है ।मेरे लिए प्रश्न अप्रत्याशित था ।मैने कहा तुम तो बहुत सुंदर हो शुशील हो ।उस ने मेरी बात सुनते ही कहा -अच्छा दीदी आप बताओ कि यदि मैं सुंदर भी हूँ सब ठीक ठाक भी है तो मेरा पति दूसरी औरत के पास क्यों जाता है अब उसकी आवाज में कम्पन था गला रुंध गया उसका और बताने लगी कि मैं बड़े व्यापारिक परिवार से आई हूं दान दहेज सब बढ़ चढ़ कर लाई थी बिल्कुल स्वस्थ हूँ  मैं पर उसको नही रोक पाई हूँ।मेरी बुध्दि अब काम ही नही करती ।इस सवाल का कोई छोटा सा जवाब नही बनता था ।मैं उसे इतना कह पाई कि धैर्य रखो और अगला शब्द यह निकला कि तुम सर्वक्षेष्ठ यह तुम्हे पता है पर तुम ने खुद को वही मान लिया जो तुम्हारा मनोबल गिराने के लिये तुम से कहा गया है ।वह सब आज से डिलीट खुद को देखना शुरू वह तुम्हे देखेगा ।और अगली मुलाकात का वादा कर मैं चली आई क्योंकि  हमारी वजहँ से  ट्रैफिक रुक रहा था  बाकी महिलाओ ने भी अपनी गाड़ियां निकालनी थी ।उस दिन मैने उस औरत की आखो में तिरस्कार कर दिए जाने बाद रूह में बस जाने वाली  गजब की पीड़ा का एहसास किया ।रास्ते भर सोचती आई थी कि मुश्किल बहुत है रिजेक्शन को बर्दाश्त करना कि तुम मेरे लायक नही हो ।आज फिर नया केस आया तो सोचा इस पर भी लिखा  ही जाए ।
आये दिन हम ऐसे अनेक लेख आलेख  पढ़ते है  वीडियो देखते है पॉडकास्ट  सुनते है विवाहेतर सम्बन्ध क्या है ?  क्यों है ? पति को कैसे वश में रखें ? कैसे पति को रिझायें ?  कैसे कपड़े पहनें ? क्या रात को करें ? क्या दिन में करें? बिस्तर पर क्या व्यवहार करें ? क्या करें कि पति आपकी ओर आकर्षित ही रहे ?  आप ऐसा करें ? या  आप वैसा करें ऐसे कितने ही ऐसे लेख हम सब के सामने अक्सर आते रहते  है ।कभी हम पढ़ लेते है कभी नजर अंदाज करते हैं किसी का टाइटल इतना आकर्षक होता है लेख के  भीतर कुछ भी नही ।ऐसे लेख छप इस लिए रहें है कि समाज मे यह समस्या तो है  जिस पर बात की ही नही जाती है आपसी सम्बन्धो में  अनेक ऐसे मामले हैं जो थोड़ी सी समझदारी से हल किये जा सकते थे ।पर समय रहते उस विषय पर समझ पैदा करने वाला कोई नही था । किसी अच्छे काउंसलर  की सलाह लेना मंहगा भी है और सब की पंहुच में भी नही है । समस्या जिन्हें है वह उन से बात कर रहे होते हैं जो उनके आस पास उपलब्ध है जरूरी नही कि समस्या सुनने वाले मित्र या परिजन इतने परिपक्व या अनुभवी हों कि कोई राय दे सकें ।अक्सर हल निकल नही पाया । 

   मैं भी  इस विषय पर अपना  दृष्टिकोण सांझा करूँ ।
विवाहेतर सम्बन्ध का अर्थ है विवाह के बाद किसी अन्य स्त्री या पुरुष से बनाये गए सम्बन्ध और अधिकतर इसका आशय  अन्य स्त्री या पुरुष से बनाये गए शारीरिक संबंधों के संदर्भ में ही लिया जाता है ।
आज हम इस विषय पर  विस्तार से चर्चा कर लेते हैं समझने की कोशिश करते है ।सब से पहले हम सब को यह जानना है मनुष्य की मानव की हम इंसानो की प्रकृति क्या है ? दरअसल मनुष्य जैविक रूप से ही किसी एक साथी के साथ रहने के लिए बना ही नही है मनुष्य अपने जीवन मे अनेकानेक स्त्री पुरषों सम लिंगियों उभय लिंगियों से सम्बन्ध बनाता है ।आप यदि प्रकृति को करीब से समझे तो पूरी सृष्टि में केवल पक्षी ही हैं जो 90 प्रतिशत एक साथी संग रहते जीते और मरते हैं स्तनपायी जीवों में यह व्यवहार नही मिलता है  6500 स्तनपायी जीवों की प्रजातियों में खुले सम्बन्ध ही होते है ।मनुष्य के जैविक इतिहास में मनुष्य एक साथी रखने वाला प्राणी नही है । यह उसकी प्रकृति ही नही है ।विकास के क्रम में मनुष्यो ने अपनी ताकत बढ़ाने के लिए अन्य जीवों पर अपनी सत्ता बनाने और बनाए रखने के लिए  समाज बनाया । एकल की ताकत और झुंड की ताकत में फर्क होता है और सत्ता जैविक है जो बलशाली है वही जीवित है । मनुष्यो का एक झुंड समूहिक नियंत्रण में रह कर अपना सार्थक  विकास करता रहे इसके लिए समाज ने नियंत्रण के नियम बनाये और लागू किये ।सब कबीलों के अपने नियम कायदे कानून ।यौन व्यवहार पर नियंत्रण के लिए भी कानून बनाये ।हर कबीले के लोगो का यौनिक व्यवहार और उसके नियम अलग अलग मिलेंगे ।कहीं पर किसी तरह के व्यवहार को मान्यता मिली हुई होगी ।कहीं पर वर्जित होगा ।एक बात तय है कि हर नियम कबीले के ताकतवर के पलड़े में झुका हुआ मिलेगा ।बहु पति व्यवस्था ,बहु पत्नी व्यवस्था ,रिश्ते नातों में भी किस किस से सम्बन्ध जायज किस से नाजायज कहलाये जाएंगे सब समाज की देन है ।प्रकृति को तो अपना च्रक निर्बाध चलाने के लिए एक नर और एक मादा की ही जरूरत है और उनके बीच दैहिक संबंध बनवाने के लिए दिमाग मे रसायन के स्त्राव का प्रबंध भी दे कर भेजा गया है जिस दौरान वह रसायन रिसता है तो बुध्दि जड़ रहती है ।प्रकृति का एक मात्र लक्ष्य है प्रजनन वह उस व्यवस्था में आज तक खरी है ।
चलिए आगे बढ़ते हैं अब आते है विवाह पर ।यौन व्यवहार पर  नियंत्रण और प्रजनन सुनिशिचत हो सके और इस से होने वाली संतान की भरण पोषण की जिम्मेदारी किसी के कंधे पर डालने के लिए विवाह की व्यवस्था का निर्माण हुआ ।इसी जिम्मेदारी के निर्वहन हेतु पितृ सत्ता और मातृ सत्ता व्यवस्था का  निर्माण हुआ ।अगर सारी पूंजी सम्पति साधन संसाधन का मालिकाना हक स्त्री के पास हो तो उस कबीले में हर बच्चे के भरण पोषण की जिम्मेदारी स्त्री की ।और यदि बच्चों का भरण पोषण पुरुष की जिम्मेदारी तो सारा धन साधन संसाधन पर अधिकार पुरुष का ।
सत्ता या व्यवस्था कोई भी सब के केंद्र में रहा बच्चों का भरण पोषण ।यदि सन्तान न हुई यदि सन्तान न बची तो सब खत्म ।इतिहास कथा कहानी सभ्यता सब खत्म 
। प्रजनन करना है नई  पीढ़ी को बनाना भी है  बचाना भी  है । विकास के क्रम में ही ईश्वर की अवधरणा पुख्ता हुई धर्म आस्था यह सब निर्माण हुआ और इंसान को केवल और केवल  ईश्वर से डर लगा  क्योंकि उस की नजर उस से ज्यादा ताकतवर वही था । और समाज ने इसी कमजोरी को पकड़ते हुए विवाह के नियम में  ईश्वर को साक्षी रख लिया ताकि यह व्यवस्था बनी रहे और यौनिक नियंत्रण सधा रहे इस नियंत्रण को साधने से अनेक उत्पात नियंत्रण में आ गए ।बहुत कुछ सध गया ।यह अकाट्य फार्मूला सिद्ध हुआ जो प्राकृतिक रूप से स्वतन्त्र जीव पर नकेल कसने में कामयाब हुआ और परिवार कुटुम महत्वपूर्ण बन गए ।समाज मे आश्चर्यजनक नियंत्रित सामाजिक  व्यवस्था बन गई और कबीले संस्कृतियां फलने फूलने लगी ।अपवाद में जो भी घटित होता गया उसी के अनुसार नियम बनते चले गए ।
अब 2022 है विश्व भर  के मानव  कबीले  इतना लंबा कई सौ  हजारो वर्षो का सफर कर चुके है ।गगन चुम्बी इमारतों के  भौतिक विकास से होते हुए मंगल पर जाने के वाहन भी बन गए और चले भी गए ।ये अलग बात है कि हमारा चन्द्रयान तो भटक कर  किसी खड्डे में पड़ गया और हमें कभी कोई  नासा  पड़ोसी बताता है कभी कोई बताता है कि जी आपका बालक यहां देखा है कोई कहता है वहां है पर हमारा वाहन न मिला ।अब तो हम नया बनाएंगे तमाम दुनिया मे सब से  सस्ते में  बनायेनंगे और इस बार  रास्ते पर ज्यादा नजर रखेंगे हम और इस बार तो  यात्रा का उद्घटान तो बिल्कुल  नही करवाएंगे किसी से भी चाहे प्रधन्मन्त्री ही क्यों न हो ) 
जिस विषय पर लेख चल रहा  है वह भी चंद्रयान की तरह भटक सकता है तो चलो पुनः लौटते है विवाहेत्तर सम्बन्धो की ओर । हम वर्तमान संदर्भ में इस लेख को आगे बढाते हैं ।


भारत मे समाज अब तेजी से बदल रहा है खास तौर पर वैवाहिक मान्यताएं और सामाजिक व्यवस्थाएं बदल रही हैं आज से मात्र दस वर्ष पूर्व भी अधिकतर भारतीयों ने "ओपन मैरिज" नामक चिड़िया का नाम भी नही सुना होगा .पर आज प्रचलन में है विवाहित स्त्री पुरुष आपस मे भी सम्बन्ध बना लें और पति अपनी मर्जी से पति अपनी मर्जी से  चाहे कहीं भी सम्बन्ध बना लें पर साथ साथ बने भी रहें ।यह बात मैं अपनी सास को बता दूं तो उसको तो पसीने आ जाएंगे ।वे हक्की बक्की रह जाएगी मुँह खुला का खुला रह जायेगा ।कहेगी हे राम पढ़ाई लिखाई इसे इसे काम सिखावे या तो कोई काम की पढ़ाई ना हुई ।
अब मैं उन वैवाहिक जोड़ो की ओर मुखातिब होती हूँ जो केवल विवाह हेतर सम्बन्धो के कारण  तलाक की दहलीज पर खड़े  है । और अबोध  बच्चे न उस घर के   अंदर हैं न बाहर न ही उन्हें दहलीज का ही पता है ।
हालांकि तलाक के मामलों में केवल विवाह हेतर संबध ही एक अकेला कारण नही है आपसी हिंसा ,कमाई का न होना , व्यसन  ,व्याधि,  सन्तान का न होना ,सेक्स का न होना एवं  अन्य भी  छोटे बड़े  कारण है  जो दो विवाहितो को अलग करते हैं ।

लोग विवाह के बाद भी दूसरे के प्रति आकर्षित क्यों हो जाते हैं ? 
मनुष्य स्वभाव और प्रकृति से एक साथी से सम्बन्ध रखने वाला प्राणी नही है ।वह बार बार आकर्षित होगा बस उसे फुरसत और इसके लिए  उचित परिस्थितियां मिलेंगी तो यह प्रयोग कर ही लेगा ।कभी नही चूकेगा ।(अपवाद यहां भी हैं )
व्यक्ति हर उस चीज की ओर आकर्षित होता है जो उसकी पंहुच से बाहर हो और अगर कभी उस से पंहुच से बाहर की चीज स्वयं चल कर आ जाए तो पौ बारह है ही  । किसी नए साथी से मिलने वाली अटेंशन में रोमांच है यह नितांत नया अनुभव होगा ।नई नजदीकी नई गन्ध का अनुभव होगा दिमाग मे एंडोर्फिन लेवल बढेगा और वही नशा बार बार ट्रिगर करेगा । आनन्द की अनुभूति तो  होती ही  है ।आप को कोई चाहने लगता है तो स्वयं पर विश्वास बढ़ने लगता है ।यह तो अपेक्षित ही है कि अगर किसी नए व्यक्ति के संपर्क में  आ जाये और यदि  वह व्यक्ति  उस का प्रसंशक भी  है तो वह प्रतिदिन या दिन में बीस बार प्रसशा के शब्द सुनने की लज्जत हासिल करेगा  ।  प्रसंशा से प्रसन्नता अतीव होगी ।आप डिमांड में हो यह भी भावना को बल मिलेगा ।
हम सब मनुष्य  सदैव दुसरो के गुणों से,  उनकी योग्यता से, उनकी लुक्स से , उपलब्धियों से ,ताकत से , प्रतिष्ठा से ,बुद्धि से ,अनुभव से  प्रभावित होते ही रहते है  और तो क्या ही कहें हम  मनुष्य तो किसी की एक छोटी सी अदा पर पर आकर्षित हो सकते है आकर्षण नितांत सहज और  जैविक है  आकर्षण के बाद का निकट सानिध्य और सहवास  बुध्दि की ही उपज है ।आकर्षण से हासिल हुई नजदीकी से बुध्दि संभावना खोजने निकल लेगी कि यहां पर इस से इतर भी कुछ अनुभव की गुंजाइश हो सकती है ।इस स्तर पर पुरुष की आतुरता तो देखते ही बनती है (कुछ  पुरषों को अपवाद में भी रख लेना चाहिए जिनकी बुद्धि में ब्रेक भी होते हैं  )
हम सब मे कोई न कोई  गुण प्रसंशनीय होता है किसी मे कोई गुण है किसी मे कोई  ।तो हमें वही व्यक्ति आकर्षक लगेंगे जैसे की हमें खोज होती है ।और यह खोज अवचेतन में होती है ।इसलिए आकर्षण कटघरे में नही पर उस के आगे कितना नियंत्रण किया गया ,या नियंत्रण सोचा नही गया वह कृत्य  कटघरे में लाएगा ।

और आप को याद करवा दूँ पितृ सत्ता समाज मे आज भी यह विचार उतना ही पुख्ता है आकर्षित हो कर आने वाली स्त्री के साथ बिना सहवास किये जाने देंने का मतलब मर्दानगी पर लानत है इसलिए वह उस स्तिथि तक लाने के लिए प्रपंच रच लेता है ।फर्क अब इतना आया है समाज मे।  कि अब यही सोच स्त्रियों के पास भी ट्रांसफर हो गई है कि यदि आकर्षित हो कर  कोई पुरुष आ ही गया था तो बिना कपड़े उतरवाए जाने कैसे दिया । इसलिए बराबरी दोनो तरफ हो रही है और आगे आगे और भी बदल जायेगा ।और अब तो इस तरह का ट्रैप लगाना  व्यवसाय बन गया है ।हालांकि यह फंदे यानी ट्रैप भी सदियों पुराने है पर कारगार आज भी हैं ।अंततः हनी ट्रैप का शहद बाद में कड़वे ही निकलेंगे ।
किसी पर टपक जाए उस को ले बैठेंगे चाहे विवाह हो,परिवार हो व्यापार हो या सत्ता ।
इसी आकषर्ण को बनाये रखने के लिये तो श्रृंगार ,वेश भूषा ,सुगन्धों का ईजाद हुआ यह न होता तो आज भी बिना पत्तों के या सब एक जैसे पत्तों से लिपटे  बालों की जटाएं बढाये हुए यूँ ही घूम रहे होते ।ये शिनैल नाम के पर्फ्यूम की खोज हुई ही न होती ।
सदा आकर्षक बने रहने के लिए इतना बड़ा बाजार है सदियो से  बाकायदा प्रशिक्षण दिया जाता रहा है कि कैसे सदा आकर्षक रहें ।जो इधर उधर साइटों पर आप लेख आप पढ़ते हो ना कि पति को  या पत्नी को कैसे काबू में रखा जाए वह यही अदाएं ही  सिखाते है ।यह नीम हकीम खतरा ए जान है क्योंकि हर मनुष्य अलग है अलग संस्कृति मूल्यों में बड़ा होता है इसलिए इस लेखों और वीडियो में बताए जा रहे  पति को न्यूड हो कर सरप्राइज देने का उपाय यहां नही चलता बल्कि उल्टे  दो थप्पड़ पड़ सकते हैं ।
हमारे पूर्वजो को   इस आकर्षण के सिद्धान्त का पता था इसलिए वह चरित्र निर्माण पर बल देते थे यानी स्व  नियंत्रण पर बल देते थे ।ताकि मैन मेड या वीमेन मेड विपदाओं से बचा जा सके ।
आगे बढ़ते हैं 
रिश्ते में विश्वास घात होता है तो क्या होता है ?

जिस समाज मे काम काम जो छुप कर किया जाए वह उस समाज अनुरूप  निसन्देह गलत है ।गलत को तो उ छुपाने के झूठ बोला जाएगा ।और झूठ को स्थापित करने के लिए झूठ बार बार बोला जाएगा ।झूठ पकड़ा भी जाएगा ।आपसी बातचीत में तल्खी आएगी ।आपसी  कड़वाहट,शारीरिक व शब्दिक  हिंसा ,आरोप प्रत्यारोप होगा एक दूसरे को जिम्मेदार ठहराया जाएगा ।असुरक्षा होगी ।अवसाद ,ग्लानि ,सब चले जायेंगे ।मानसिक पीड़ा होगी ।ठुकरा दिए जाने का एहसास बहुत पीड़ा दायक होगा ।क्रोध होगा बच्चों पर यह क्रोध उड़ेल दिया जाएगा ।अहं को चोट पंहुचेगी ।स्वाभिमान गिर जाएगा । असुरक्षा होगी ।घर टूटने की चिंता ।सर से छत निकल जाने की चिंता  ।खुद के और बच्चों की रोटी पढाई लिखाई सब की चिंता ।समाज के ताने,  उलाहने उपहास की चिंता ।हर तरह की असुरक्षा और भी उग्र और हिसंक बना देगी माहौल को ।एक रिस्ते के खत्म होने का  मनोबैज्ञानिक ,दंड भी होता है ,आर्थिक दंड भी होता है और सामाजिक दंड भी होता है ,यह व्यवस्था सामाजिक है समाज द्वारा पुरस्कृत और  स्वीकृत है इसलिए समाज का दबाव भी आएगा ही ।हमारा कानून भी सहजता से विवाह को टूटने नही देना चाहता ।

 रोमांचक खेलो में एक चेतावनी लगी होती है "  आप की जान का खतरा हो सकता  है " वहां पर तो केवल आप की जान जाएगी पर इस इंफीडिलिटी नामक  रोमांचक खेल में  में तो पूरे परिवार का जीवन भर का रोमांच खत्म जाएगा  और कई बार तो साथी दुनिया से ही  चला जाता है  और वह भी बच्चों सहित ।इसलिए यह बहुत खतरनाक है इस मे धैर्य और संयम ही काम आएगा ।
जितना बच सके तो बच लें ।


कैसे पता करें कि साथी चीटिंग कर रहा है?
यह पता लगाना कि साथी धोखा दे  कर रहा है तो बड़ा आसान  है  और थोड़ा मुश्किल भी ।
दो तरह के धोखेबाज होते है एक तो  धोखे देने में एक दम पारंगत और एक होते है साधारण से धोखेबाज 
साधारण की कैटेगरी में वह है जो कहीं आकर्षित हुए या कर लिए गए पर वे भावनाओं में बह गए और आगे बढ़ते चले गए कुछ सोच ही पाए । धीरे धीरे इतनी दूर निकल गए कि लौटने की सुध ही न रही ।वे तब तक बहते जाते है जब तक नया साथी उन्हें जमीन न दिखा दे ।
हर लहर का  एक समय होता है वह पूरे जोर से ऊपर उठती है और अंततः नीचे की ओर आती है ऊपर की ओर जाते हुए तो सब ऊपर ही ऊपर दिखता है  नए सपने नये आकाश नया जीवन ,सब रंगीन दिखता है और जब लहर लौटती है तो धरती भी दिखने लगती है और किनारे भी दिखते हैं और तल की गहराई भी दिखती है ।
तब परिवार छोड़ दिये बच्चे रस्म रिवाज सब दिखते हैं ।पर लौट आने का साहस नही जुटा पाते ।

नए नए प्रेम में पड़े व्यक्ति को हर कोई उसकी आंख से पहचान लेता है ।
1 वह आंखे चुराने लगता है 
2 झूठ बोलने लगता है 
3 व्यवहार में परिवर्तन आता है 
4 वह अधिक प्यार से पेश आने लगता है अपने स्वभाव के विपरीत 
5 या वह बहुत बेरुखी से पेश आता है 
6 अपनी निजी वस्तुएं लॉक में रखना लगता है 
7 फोन और सभी गैजेट्स पर लॉक लगा दिए जाते हैं 
8  किसी से फोन पर बात करने का लहजा बदला हुआ मिलता है 
9 किसी खास निश्चित वक्त पर बेचैनी होना ।रेस्टलेस हो जाता है 
10 बात बात पर  गुस्सा होना । चिड़चिड़ा पन प्रकट होना ।
11 तैयार होने में वक्त लगाना सोच कर पहनने लगना 
लुक्स पर ज्यादा ध्यान देना 
12 घर मे  मन नही लगना 
13 साथी से दूरी बनाना ।दूरी बनाने के बहाने बनाना 
14 बिना बताए घर से निकल जाना 
15 बाहर वक्त ज्यादा बिताना 
14 यात्राओं का बढ़ना 
15 खाने की आदतों का बदलना 
16 बातचीत का लहजा बदल जाना 
17 बोली में नए शब्दो का नए लहजो का प्रयोग बढ़ जाना 
18  जगह की पसंदगी  में बदलाव आ जाना 
20 संगीत की पसंद में बदलाव आना 

क्योंकि जब कोई व्यक्ति किसी के प्रेम आकर्षण में होता है तो वह अनजाने में वह सब आदते रुचियां अपने अंदर उतारने की कोशिश करता है जो उस के नए साथी को पसंद होता है ।यहां तक अनेक बार उठने बैठने के तरीके में भी बदलाव आ जाता है यह सब बदलाव अस्थायी होते है सिर्फ मादा को लुभाने के लिए जाने वाले करतब है जो हासिल हो जाने पर गायब हो जाते है और इंसान अपनी मूल प्रकृति में लौट आता है  ।धरती के सभी नर ।मादा को लुभाने के लिए कोई  झुंडों में जोर आजमाइश करता है कोई लड़ता है कोई नाचता है कोई पंख फैलाता है कोई चक्कर काटता है कोई सर नीचे टांगे ऊपर कर के करतब करता है कोई सींग चमकाने लगता है कोई कुछ करता है कोई कुछ पर सबका उद्देश्य एक ही है मादा से संसर्ग ।
ये जो नए नए परफ्यूम ट्राई किये जाते हैं नई नई कार सवारी यह सब  लुभाने वाले करतबों के आधुनिक रूप है ।
अब बात करते है दूसरी श्रेणी के मर्दो की जो घोर शातिर है उनकी पत्नियों को ताउम्र शक भी नही होता कि वे बाहर क्या कर रहे है ।वे ऐसी कोई हरकत नही करते जिस से वे पकड़े जा सकें ।वे परिवार और बच्चों की नजर में आदर्श पति और आदर्श पिता के रूप में स्थापित रहते है  कभी कोई लड़की आरोप लगा भी दे तो सारा परिवार कसमें खाता है उनकी और आरोप लगाने वाली को ही कटघरे में खड़ा करती है पत्नियां 
यानी पत्नियां उन पर छोड़ दी जाती है कि जाओ भिड़ लो इन से यह तुम्हारे सुहाग के लिए खतरा बन कर आई है।ये मर्द बुध्दि का आला इस्तेमाल करते है और सब व्यवस्थित रखते हैं ।इनके जीवन मे कितनी महिलाएं आई गई इनको भी याद नही होगा ।कुछ तो ऐसे हैं जिन्होंने अन्य महिला मित्रो को भी कभी निराश नही किया और वे भी  अपने अपने क्षेत्र में स्थापित कर दी गई भनक भी न लगी ।

और कुछ ऐसे है जो शातिर थे और उनको एक ही शातिर महिला ने जेल की हवा खिला दी ।ज्यादतर मर्डर एक दूसरे को धमकाने और बर्बाद कर देने वाले  
मैं अपने सामाजिक अनुभव के दावे से कह सकती हूं कि भारत मे  अवैध संबंधों के चलते  इतने तलाक नही हुए है जितने मर्डर हुए हैं । आज हम यदि यह रिसर्च करेंगे तो मर्डर का प्रतिशत ज्यादा होगा तलाक का कम 
और यदि मर्डर और आत्म हत्या दोनो को शामिल कर लेंगे तो तलाक की संख्या बौनी हो जाएगी । 

कुछ जोड़े ऐसे हैं जिनका सो कॉल्ड पहला प्यार,पहला ब्रेक अप  उनके जीवन में दोबारा आ जाता है और वे शिकवे गीले भुला कर पहला सा जीवन जी लेने की नाकाम कोशिश करते है और घर तोड़ बैठते हैं ।अक्सर इन में से किसी एक का तो पहले से ही बिखरा होता है अब इनका नोस्टाल्जिया दूसरे का भी तोड़ बैठते हैं ।


आपका साथी चीटिंग कर रहा है तो क्या करें ?
जब आपको पता चल गया है तो आप धैर्य से काम लें 
उतेजित मत हों ।उन से बैठ कर बात करें ।उन्हें अपनी बात कह लेने का मौका दें ।आप सख्ती न दिखाए न ही धमकाएं ।
वह गलती राह  पर हैं तो डरे हुए तो हैं ही  और डरा हुआ जीव ही आत्म रक्षा में पहला अटैक करता है वह आपको दोषी ठहरायेगा । आप पर आरोप लगाएगा कि तुम ऐसी नही हो वैसी नही हो ये और वो ।उन आरोपों से आहत हो जाओगे तो बुरा भला गाली गलौच करोगे ।हिंसा पर उतारू होगे ।इस से बेहतर है कि उन्हें ध्यान से सुना जाए ।समझाया जाए ।उन्हें विश्वास में लिया जाए और उन से ही पूछे कि आप बताओं हम आपका साथ कैसे दें ।हम अपने मे क्या क्या परिवर्तन लाएं ।

( आप हम से क्या चाहते हैं ) 
आप उन्हें रिश्ता टूट जाने की स्थिति में क्या क्या हानि हो सकती है वह समझाएं ।उन्हें सोचने और लौटने का वक्त दें 
सब से जरूरी कदम यह है कि अपने परिवार के सदस्यों और  माता पिता को विश्वास में लिया जाए उन से यह समस्या शेयर की जाए ।कभी माता पिता की मध्यस्थता और परिवार का दबाव भी काम कर जाती है ।आराम से बैठ कर शांत चित्त से धैर्य से  बात कर के ही हल निकालना  चाहिए हल इसी बात चीत में ही छिपा होता है लड़ने झगड़ने से कभी  हल नही निकलेगा ।कड़वाहट इतनी बढ़ेगी कि चाह कर भी तेजाब कभी कम नही होगा।

वैध या अवैध संबंधों की परिभाषा अलग अलग संस्कृति यो में तो अलग है ही पर व्यक्तियो की व्यक्तिगत मान्यताओ में भी अलग होंगी ।गलत और सही की परिभाषा सब की अपनी अपनी है।जिस बात को ले कर आप इतना ठगी हुई महसूस कर रही हूं दूसरे साथी की नजर में यह किसी अपराध की श्रेणी में ही न आता हो उसके लिए यह सब  कुछ  मायने ही न रखता हो ।सब लोग अपने विचार संस्कार  अनुभव अनुसार समस्या को अलग ढंग से देखते समझते है । आप अपने मूल्यों को दूसरे पर कभी थोप नही पाएंगी ।दूसरे को अपने जैसा सोचने और मानने को बाध्य नही किया जा सकता ।केवल अपनी सोच को बताया जा सकता है ।
प्रेम वही जो आजादी दे दे पँखो के काट रख लेने से पक्षी उड़ना तो नही भूलता ।बेशक वह अब उड़ न सकता हो पर मन उसका आसमान ही में रहेगा ।उसे उड़ने दीजिये थक कर लौट आएगा ।बस दरवाजा खुला रखिये ।
अनेक बार स्वतन्त्र समाज के विचार के प्रभाव से कुछ लोग बन्धन में घुटन महसूस करते हैं । लेकिन बाद में वह अनुभव करते है कि परिबार या साथी का होना घुटन नही बल्कि ताकत होता है क्योंकि इंसान अकेला नही रह सकता है ।उसे किसी की जरूरत जरूर महसूस होगी ।कुछ लोग ऐसा सोचते है कि वे परिवार भी छोड़ दे और जो नई गर्ल फ्रेंड बनाई है उस से भी न बंधे शादी न करें ।बस यूं ही फ्रीडम में रहे ।वे पश्चिम से प्रेरित हैं वे सब से ज्यादा घाटे में रहेंगे ।क्योंकि कोई भारतीय लड़की चाहे कितने ही वर्ष live इन मे रह ले अंततः वह भी शादी ही करना चाहेगी ।भारत मे रखैल बन कर कोई अभागी ही रहना चाहेगी ।
बाकी रोटी दो भी हो चोपड़ी हुई भी हों तो यह चल नही पायेगा ।
मेरा निजी तौर पर मानना है कि जब न निभ पाये तो अलग हो जाना बेहतर है बजाय कि कोई आत्म हत्या करे ।जीवन बेशकीमती है एक शादी विवाह जैसा बन्धन जीवन को लील जाने के लिए नही है । 


यह पोस्ट सिर्फ महिलाओ  के संदर्भ में लिखी गई है जिनके पति किसी न किसी अनैतिक रिश्ते में है 
इसके एक दम विपरीत अनेक स्त्रियां अनैतिक रिश्तो में हैं या होती है उनका मनोविज्ञान पूर्णता भिन्न है इसलिए उनके विषय मे एक और पोस्ट लिखूंगी फिर कभी ।
सुनीता धारीवाल