रविवार, 31 मई 2026

हमारे रीति रिवाज परंपरा से तर्क तक - लेख


मानव समाज अत्यंत रोचक है। पूरे विश्व में मानव कबीलों ने साथ-साथ, समूहों और झुंडों में रहते हुए अपनी-अपनी मान्यताएँ, परंपराएँ और रीति-रिवाज विकसित किए। हर रीति-रिवाज के पीछे कोई न कोई वजह, अनुभव और सामाजिक उद्देश्य छिपा होता है। आज इन्हीं विषयों पर कुछ रोचक चर्चा करते हैं।
सबसे पहले इनके शाब्दिक अर्थ समझते हैं।
‘रीति’ का अर्थ है — पद्धति और ‘रिवाज’ का अर्थ है — चलन।
अर्थात किसी विशेष कर्म को करने की वह पद्धति जो लंबे समय से लगातार चली आ रही हो।
‘परंपरा’ शब्द संस्कृत भाषा से आया है, जिसका शाब्दिक अर्थ है — बिना व्यवधान के किसी श्रृंखला या क्रम का निरंतर जारी रहना।
यानि कुछ ऐसे कर्म और व्यवहार जो पीढ़ी दर पीढ़ी बिना अधिक सवाल किए लगातार निभाए जाते रहे हों।
आज के युग में, जहाँ इंसान मंगल ग्रह पर कॉलोनी बसाने के रास्ते खोज रहा है, अंतरिक्ष पर्यटन की सुविधाएँ विकसित कर रहा है, वहीं वह सदियों पुरानी परंपराओं को भी उसी श्रद्धा और निरंतरता से निभाता चला आ रहा है।
मनुष्य वास्तव में एक अत्यंत रोचक सामाजिक प्राणी है। वह हमेशा व्यस्त रहता है — कुछ नया रचने में, कुछ पुराना सँजोए रखने में। वह भविष्य की ओर दौड़ता है, लेकिन अपनी स्मृतियों और संस्कारों को भी साथ लेकर चलता है।
हर समाज में मनुष्य का जन्म और मरण दो सबसे बड़ी घटनाएँ मानी जाती हैं, और इनके बीच का जीवन उत्सवों, मेलों और संस्कारों से भरा होता है। सदियों से मानव समाज ने शोक से अधिक उत्सवों को महत्व दिया है। यही कारण है कि हमें मानव सभ्यता के निशान कलाओं, परंपराओं, लोकगीतों और मान्यताओं में गहराई से उकेरे हुए मिलते हैं।
दुनिया भर में अनेक रोचक और रोमांचक रीतियाँ प्रचलित हैं। भारतीय समाज में भी मनुष्य के जन्म से लेकर मरण तक अनेक संस्कार पाए जाते हैं। इसके अतिरिक्त ऋतुओं, खेती, विवाह, पर्वों और सामाजिक संबंधों से जुड़े भी अनेक रिवाज हैं। पर आज हम विशेष रूप से हरियाणा प्रदेश के रीति-रिवाजों की चर्चा करेंगे।
हरियाणा, जो सिंधु घाटी सभ्यता की जीवित विरासत माना जाता है, वहाँ की परंपराएँ भारतीय सभ्यता के प्रारंभिक हस्ताक्षरों की तरह आज भी जीवित दिखाई देती हैं। यहाँ के लोकगीत, खान-पान, विवाह संस्कार, खेती से जुड़े उत्सव और पारिवारिक परंपराएँ अपने भीतर सदियों पुरानी सांस्कृतिक स्मृतियाँ सँजोए हुए हैं।
हरियाणा के गाँवों में आज भी अनेक रिवाज केवल परंपरा नहीं, बल्कि सामाजिक संबंधों को मजबूत रखने का माध्यम हैं। विवाह में गाए जाने वाले बन्ने-बन्नी के गीत, तीज और सावन के झूले, फसल कटाई के बाद सामूहिक उत्सव, नवजात शिशु के जन्म पर होने वाले संस्कार, और मृत्यु के बाद सामूहिक शोक प्रकट करने की परंपराएँ — ये सभी केवल रस्में नहीं, बल्कि समाज को एक सूत्र में बाँधे रखने वाली सांस्कृतिक डोर हैं।
समय के साथ बहुत कुछ बदला है। डिजिटल युग ने जीवन की गति, सोच और संबंधों के स्वरूप को भी प्रभावित किया है। नई पीढ़ी अब मोबाइल स्क्रीन और वैश्विक संस्कृति के बीच बड़ी हो रही है। ऐसे समय में यह प्रश्न स्वाभाविक है कि क्या आने वाली पीढ़ियाँ इन परंपराओं को समझ पाएँगी? क्या वे इनके पीछे छिपे सामाजिक और भावनात्मक अर्थों को महसूस कर पाएँगी?
परंपराओं को ज्यों का त्यों ढोना ही आवश्यक नहीं, बल्कि उन्हें समझना और समय के अनुसार संवेदनशील रूप से आगे बढ़ाना अधिक आवश्यक है। क्योंकि कोई भी संस्कृति केवल अतीत से नहीं, बल्कि वर्तमान की समझ और भविष्य की आशा से जीवित रहती है।
परिवारों में विवाह के उत्सव के दौरान अनेक लोक-कर्म और रस्में निभाई जाती हैं। हम सभी उन्हें परंपरा मानकर करते तो हैं, पर क्या कभी ठहरकर यह पूछा है कि इन्हें क्यों किया जाता है?
और यदि कभी पूछा भी हो, तो अधिकतर यही उत्तर मिला होगा —
“बेरा ना… बड़े-बूढ़े न्यू ही करते आए, हम ने भी सीख लिया।”
विवाह उत्सव में हम अनेक कर्म करते हैं, पर उनका तर्क और उद्देश्य अक्सर समझ में नहीं आता।
ज़रा सोचिए —
विवाह की कार के टायर पर पानी क्यों डाला जाता है?
दरवाजे की चौखट पर तेल क्यों डाला जाता है?
दूल्हे को घोड़ी पर बैठाकर पूरे गाँव में क्यों घुमाया जाता है?
दूल्हा-दुल्हन पर नीम क्यों झाड़ी जाती है?

ऐसे न जाने कितने कर्म हैं, जिनका पालन तो पीढ़ियों से होता आया है, लेकिन जिनका वास्तविक कारण बहुत कम लोगों को पता है।
इन सब प्रश्नों के उत्तर समझने के लिए हमें उस समय को समझना होगा, जब ये रीति-रिवाज जन्मे थे। ये परंपराएँ उस दौर की देन हैं, जब मानव कबीले एक स्थान से दूसरे स्थान तक पलायन करते हुए अंततः स्थायी रूप से बसने लगे थे। धीरे-धीरे खेती शुरू हुई और पूरा सामाजिक तथा आर्थिक ढाँचा कृषि और श्रम आधारित जीवन पर टिका हुआ था।
उस समय विवाह केवल दो व्यक्तियों का संबंध नहीं था, बल्कि दो परिवारों, श्रम-समूहों और सामाजिक इकाइयों का जुड़ाव था। इसलिए विवाह से जुड़े अनेक कर्मों का संबंध स्वास्थ्य, सुरक्षा, सामाजिक अनुशासन, श्रम-विभाजन, प्रजनन क्षमता, सामूहिक पहचान और मनोवैज्ञानिक तैयारी से था।
समय के साथ उनके मूल कारण धुंधले पड़ गए, लेकिन रस्में बची रहीं। आज आवश्यकता केवल उन्हें निभाने की नहीं, बल्कि उन्हें समझने की भी है — ताकि हम यह जान सकें कि हमारी परंपराएँ केवल अंधविश्वास नहीं, बल्कि अपने समय की सामाजिक बुद्धिमत्ता और जीवन-अनुभवों की अभिव्यक्ति भी थीं।
खेड़ा क्यों पूजते हैं?
ईश्वर की धारणा मनुष्य के भीतर बहुत प्राचीन और व्यापक रूप से पाई जाती है। आदिकाल से मनुष्य ने प्रकृति की अनेक ऐसी घटनाओं को देखा और महसूस किया, जिन पर उसका कोई नियंत्रण नहीं था।
भूकम्प आया तो उसे लगा कोई अदृश्य शक्ति धरती को हिला रही है। तूफ़ान उठा तो लगा कोई है जो उसे बना भी रहा है और अपनी इच्छा से शांत भी कर रहा है। सूनामी, आकाशीय बिजली, सूखा, अतिवृष्टि — ऐसी अनगिनत प्राकृतिक घटनाएँ थीं, जिनके सामने मनुष्य स्वयं को असहाय महसूस करता था।
यहीं से उसके भीतर यह विश्वास जन्म लेने लगा कि कोई ऐसी शक्ति अवश्य है, जो उससे अधिक शक्तिशाली है। उसी भावना से ईश्वर की अवधारणा ने जन्म लिया। फिर उसकी आराधना, अर्चना और आह्वान की परंपराएँ विकसित होने लगीं।
“खेड़ा” भी इसी मानवीय मनोविज्ञान और सामाजिक संरचना से जुड़ी एक अवधारणा है। खेड़ा एक प्रकार का काल्पनिक या प्रतीकात्मक रक्षक देव माना गया। जब पुराने समय में कबीले एक स्थान से दूसरे स्थान पर जाकर बसते थे, तब वे सबसे पहले किसी निश्चित स्थान पर ईंटों या मिट्टी से उस रक्षक देव की स्थापना करते थे। उसके बाद धीरे-धीरे वहाँ पूरा गाँव बसता था।
वह स्थान केवल पूजा का केंद्र नहीं होता था, बल्कि सामूहिक सुरक्षा, विश्वास और एकता का प्रतीक बन जाता था। गाँव में कोई नया व्यक्ति आता — चाहे वह नवजात शिशु हो, विवाह के बाद आने वाली दुल्हन हो, या कोई अन्य व्यक्ति जो पलायन करके उस गाँव में स्थायी रूप से बसना चाहता हो — वह खेड़ा देव को प्रणाम कर स्वयं को उस समुदाय का हिस्सा मानता था।
इस प्रकार खेड़ा केवल धार्मिक प्रतीक नहीं था, बल्कि सामुदायिक स्वीकृति और संरक्षण का प्रतीक भी था।
यह परंपरा आज भी अनेक गाँवों में जीवित है। इसके मूल में मनुष्य का उस शक्ति के प्रति समर्पण, सुरक्षा की चाह और सामूहिक विश्वास छिपा हुआ है, जिसे वह स्वयं से अधिक शक्तिशाली मानता आया है।
बनड़ा या बनड़ी को घर से बाहर जाने की मनाही — मटणा लगाना और तेल चढ़ाना
विवाह से पहले दूल्हे या दुल्हन को कुछ दिनों तक घर से बाहर न जाने देना, मटणा लगाना, तेल चढ़ाना जैसी रस्में आज भले केवल परंपरा या उत्सव का हिस्सा लगती हों, लेकिन इनके पीछे उस समय की जीवनशैली और व्यावहारिक समझ छिपी हुई थी।
पुराने समय में जीवन पूरी तरह कृषि आधारित था। खेतों में कठिन श्रम करना पड़ता था और धूप, मिट्टी तथा मौसम का सीधा प्रभाव शरीर और त्वचा पर पड़ता था। लगातार खुले वातावरण में काम करने से त्वचा पर टैनिंग, रूखापन और कई बार संक्रमण भी हो जाते थे।
ऐसे में विवाह जैसे बड़े उत्सव से पहले दूल्हे और दुल्हन को कुछ दिनों तक घर के भीतर या छाँव में रखा जाता था, ताकि शरीर को आराम मिले और त्वचा धूप से बची रहे। इसी दौरान उन पर हल्दी, तेल और विभिन्न जड़ी-बूटियों का मिश्रण लगाया जाता था। कई दिनों तक लगातार उबटन और तेल से मालिश कर नहलाने की प्रक्रिया चलती थी।
इससे खेतों की धूप से हुई टैनिंग कम होती, त्वचा मुलायम और कांतियुक्त बनती, और हल्दी अपने प्राकृतिक गुणों से त्वचा के संक्रमणों को भी दूर करती थी। हल्दी उस समय का प्राकृतिक एंटीसेप्टिक और सौंदर्य प्रसाधन दोनों थी।
तेल क्यों चढ़ाया और उतारा जाता है?
दूल्हा और दुल्हन की त्वचा में नमी बनाए रखने के लिए शरीर पर तेल लगाया जाता था। तेल की मालिश से शरीर को आराम मिलता था और त्वचा को पोषण मिलता था। परिवार की महिलाएँ बारी-बारी से यह कार्य करती थीं। यह केवल रस्म नहीं, बल्कि अपनापन और स्नेह का प्रतीक भी था।
तेल लगाने के बाद दही का प्रयोग उसकी अतिरिक्त चिकनाई को संतुलित करने के लिए किया जाता था। दही त्वचा को ठंडक देता था और उसे साफ व कोमल बनाता था। बालों को भी दही से धोया जाता था, जिससे वे मुलायम, स्वच्छ और चमकदार बनते थे।
आज जिस प्रकार लोग महंगे स्किन और हेयर ट्रीटमेंट करवाते हैं, उस समय यही घरेलू उपाय प्राकृतिक सौंदर्य प्रसाधन का कार्य करते थे। उस दौर में पानी की उपलब्धता भी सीमित थी। रोज़ स्नान करना हर किसी के लिए संभव नहीं था, इसलिए विवाह के अवसर पर दूल्हे को विशेष रूप से स्नान, मालिश और सजने-सँवरने का अवसर मिलता था। ऐसे में चेहरे पर चमक आना स्वाभाविक था।
फिर सुंदर वस्त्र, आभूषण और श्रृंगार दूल्हा-दुल्हन को सबसे अलग और आकर्षक बना देते थे। पूरे उत्सव का केंद्र वही होते थे। सबकी निगाहें उन्हीं पर टिकती थीं — ठीक वैसे ही जैसे आज किसी सेलिब्रिटी पर होती हैं।
स्वागत में दरवाजे पर तेल चढ़ाना, गाड़ी के टायर पर पानी डालना और तेल चढ़ाना
पुराने समय में बारातें मोटर कारों से नहीं, बल्कि बैलगाड़ियों, रथों और लकड़ी की मंझोलियों पर जाया करती थीं। उन गाड़ियों के पहिये भी लकड़ी के होते थे। लंबी यात्राओं के दौरान रास्ते की मिट्टी, कीचड़ और धूल पहियों में भर जाती थी। लगातार चलने से पहियों की धुरी में लगी चिकनाई भी समाप्त होने लगती थी।
उस दौर में यह एक सामान्य सामाजिक आचरण था कि मेहमान की गाड़ी के पहियों को पानी से धोया जाए और उसकी धुरी में तेल या चिकनाई डाली जाए। यह केवल सम्मान का प्रतीक नहीं था, बल्कि अतिथि की वास्तविक सहायता भी थी, ताकि उसकी वापसी की यात्रा सुगम हो सके।
धीरे-धीरे यही व्यवहार परंपरा बन गया। समय बदला, बैलगाड़ियों की जगह मोटर कारों ने ले ली, लेकिन सम्मान की वह भावना आज भी बनी हुई है। इसलिए आज भी विवाह में दूल्हे की कार के टायर पर पानी डालना और तेल लगाना उसी पुरानी परंपरा का आधुनिक रूप है।
पुराने समय में गाँव, कुनबे या बस्तियों के बड़े-बड़े मुख्य दरवाजे हुआ करते थे। वे भारी लकड़ी के बने होते थे और रोज़मर्रा में कम ही खोले जाते थे। जब कोई रथ, बैलगाड़ी या बड़ा वाहन भीतर आता, तभी वह मुख्य द्वार खोला जाता था। उसी बड़े दरवाजे में एक छोटा दरवाजा भी बना होता था, जिससे आम लोगों का आना-जाना होता था।
बड़े दरवाजे भारी होने के कारण उनकी चूलों और कुंडों में समय-समय पर तेल डालना आवश्यक होता था, ताकि वे आसानी से खुल-बंद हो सकें। विवाह के अवसर पर जब बारात के रथ और बैलगाड़ियाँ भीतर लाई जाती थीं, तब उस मुख्य द्वार की चूलों में तेल डाला जाता था।
आज भले ही वैसी विशाल चौपालें और किले जैसे दरवाजे नहीं रहे, लेकिन परंपरा अभी भी जीवित है। अब हम प्रतीक स्वरूप अपने घर के दरवाजे पर तेल चढ़ाते हैं और बिना जाने उस पुरानी सामाजिक स्मृति को निभाते चले आते हैं।
और हाँ, एक रोचक बात यह भी है कि हरियाणा में बैलगाड़ियों में तेल का प्रयोग बहुत बाद में शुरू हुआ। उससे पहले रथों और बैलगाड़ियों की धुरी पर पटसन — जिसे हरियाणा में “सण” कहा जाता है — उसके रेशों पर मक्खन लगाकर कई परतों में लपेटा जाता था। यही मक्खन पहियों की धुरी को पूरे सफर में चिकनाई देता था, ताकि पहिये आसानी से घूमते रहें।
यानी तेल आने से पहले हरियाणा में पहियों को भी मक्खन नसीब होता था। यही तो है असली “दूध-दही वाला हरियाणा”।
दुल्हे को सजा कर गाँव में क्यों घुमाया जाता है?
दूल्हे को सजा-धजाकर घोड़ी या रथ पर बैठाकर गाँव में घुमाने की परंपरा केवल उत्सव और दिखावे के लिए नहीं थी, बल्कि उसके पीछे गहरा सामाजिक उद्देश्य छिपा हुआ था।
पुरातन समय से ही विवाह केवल दो व्यक्तियों का निजी संबंध नहीं, बल्कि एक सामाजिक क्रिया माना जाता था, जिसमें पूरे समुदाय की उपस्थिति और भागीदारी आवश्यक होती थी। उस समय समाज सामूहिक जीवन पर आधारित था, इसलिए किसी भी विवाह को सामाजिक स्वीकृति मिलना महत्वपूर्ण माना जाता था।
बारात चढ़ने से एक दिन पहले दूल्हे को सजाकर गाँव की गलियों से होते हुए देव-पूजा या खेड़ा पूजा के लिए ले जाया जाता था। यह एक प्रकार की सार्वजनिक घोषणा होती थी कि अमुक युवक अब विवाह बंधन में बंधने जा रहा है।
इस परंपरा का उद्देश्य पूरे गाँव और समुदाय को यह जानकारी देना था कि अब इस युवक का रिश्ता सामाजिक रूप से स्वीकार किया जा रहा है। यह केवल परिवार का निर्णय नहीं, बल्कि पूरे समाज की जानकारी और सहमति से होने वाला संबंध माना जाता था।
गाँव के लोग दूल्हे को देखते, आशीर्वाद देते और विवाह उत्सव में अपनी सहभागिता सुनिश्चित करते थे। इस प्रक्रिया से सामाजिक संबंध मजबूत होते थे और विवाह केवल दो लोगों का नहीं, बल्कि दो परिवारों और पूरे समुदाय का उत्सव बन जाता था।
दूल्हा-दुल्हन पर नीम क्यों झारते हैं?
विवाह उत्सव में दूल्हा और दुल्हन दोनों ही यात्रा करके एक स्थान से दूसरे स्थान पर पहुँचते थे। पुराने समय में यह सफर पैदल, बैलगाड़ियों या रथों से लंबी दूरी तय करके किया जाता था। ऐसे सफर में वे अलग-अलग वातावरण, धूल-मिट्टी और अनेक लोगों के संपर्क में आते थे। स्वाभाविक रूप से जीवाणुओं और विषाणुओं के संपर्क में आने की संभावना भी बढ़ जाती थी।
इसी कारण दूल्हा और दुल्हन के स्वागत के समय नीम का प्रयोग किया जाता था। नीम की टहनियों को उनके ऊपर झारा जाता था, ताकि यह एक पारंपरिक संक्रमण-रोधी उपाय का कार्य करे।
भारतीय लोकजीवन में नीम को केवल एक पेड़ नहीं, बल्कि प्राकृतिक सुरक्षा कवच माना गया है। नीम में जीवाणुरोधी और वातावरण को शुद्ध रखने वाले गुण पाए जाते हैं। गाँवों में आज भी नीम को घरों, चौपालों और आँगनों के आसपास इसलिए लगाया जाता है, क्योंकि उसकी उपस्थिति वातावरण को स्वच्छ और सुरक्षित बनाए रखने में सहायक मानी जाती है।
विवाह जैसे बड़े सामूहिक आयोजनों में, जहाँ बाहर से अनेक लोग आते-जाते थे, वहाँ नीम का प्रयोग स्वास्थ्य सुरक्षा की लोक समझ का हिस्सा था। चाहे दूल्हे का स्वागत हो या नई दुल्हन का गृह प्रवेश — नीम की उपस्थिति को सुनिश्चित किया जाता था।
समय के साथ यह एक रस्म बन गई, लेकिन उसके मूल में लोक जीवन का स्वास्थ्य विज्ञान और प्राकृतिक उपचार की समझ छिपी हुई थी।
परंपराएँ बदलती हैं, प्रतीक रह जाते हैं
विवाह संस्कारों से जुड़े ऐसे अनेक विधान और लोकाचार हैं, जिन्हें हम अपने परिवारों और समाज में आज भी निभाते आ रहे हैं। कंगना खेलना, सांटे मारना, दुल्हन की गोद में देवर को बैठाना, दूल्हे की माँ द्वारा पानी वारना, मिणती करना और ऐसी न जाने कितनी रस्में हैं, जिनका संबंध कभी सामाजिक संरचना, पारिवारिक मनोविज्ञान, स्वास्थ्य, श्रम-विभाजन और लोकजीवन की व्यावहारिक समझ से रहा होगा।
समय के साथ उनके मूल कारण धुंधले पड़ गए, लेकिन रस्में आज भी जीवित हैं। कुछ परंपराएँ हमें भावुक करती हैं, कुछ मनोरंजक लगती हैं और कुछ ऐसी भी हैं, जो आज की दृष्टि से चौंकाती हैं।
इस एक लेख में सभी रस्मों और उनके पीछे छिपे अर्थों को समेट पाना संभव नहीं है, इसलिए उन्हें श्रृंखलाबद्ध लेखों में शामिल करूँगी।
बहरहाल, आप भी मुझे लिख भेजिए कि आपके यहाँ कौन-कौन सी ऐसी रस्में हैं, जो आपको सबसे अधिक रोचक, रहस्यमयी या चौंकाने वाली लगती हैं। मैं उन्हें आगे के लेखों में अवश्य शामिल करने का प्रयास करूँगी।
और हाँ, चलते-चलते एक ऐसी रस्म भी याद दिलाती हूँ, जो आज के समय में बहुत लोगों को अजीब या असहज लग सकती है। कुछ स्थानों पर दूल्हा बारात चढ़ने से पहले प्रतीकात्मक रूप से अपनी माँ के स्तन को होंठ लगाता है।
इस रस्म की जड़ें उस समय में हैं, जब बाल-विवाह सामान्य थे। उस दौर में बहुत कम उम्र के बच्चों का विवाह कर दिया जाता था। कई बार बच्चे वास्तव में अभी माँ का दूध पीने की अवस्था में ही होते थे और विवाह के बाद उन्हें माँ की गोद से विदा किया जाता था। समय बदला, बाल-विवाह कम हुए, दूल्हों की उम्र बढ़ी, लेकिन रस्म प्रतीकात्मक रूप में कई स्थानों पर बनी रही। आज भी कुछ जगहों पर वयस्क दूल्हे इस परंपरा को केवल सांकेतिक रूप में निभाते दिखाई दे जाते हैं।
यही परंपराओं की सबसे रोचक बात है — समय बदल जाता है, अर्थ बदल जाते हैं, लेकिन प्रतीक कई बार सदियों तक जीवित रहते हैं।
शेष अगली कड़ी में…

सुनीता धारीवाल





जीवन: अनुकरण नहीं, चयन - सोचिये क्या आप सही में वयस्क हैं



आप शायद वह युवती हैं जो अपने माता-पिता की हर बात बिना कोई सवाल किए मान लेती हैं। आपके आज्ञाकारी स्वभाव की हर ओर प्रशंसा होती है, लोग आपकी संस्कारी छवि के पुल बाँधते हैं।
या फिर आप वह युवती हैं जो हर बात में विरोध करती हैं, जिन्हें हर निर्णय और हर कार्य माता-पिता की इच्छा के विपरीत ही करना होता है।
लेकिन सच यह है कि इन दोनों ही स्थितियों में आपका संपूर्ण व्यक्तिगत विकास नहीं हो पाया है। आप अभी जीवन को गहराई से समझने और स्वतंत्र रूप से जीने के लिए पूरी तरह तैयार नहीं हैं। सामाजिक रूप से सक्षम होना केवल आज्ञाकारी या विद्रोही होने से संभव नहीं होता।
जीवन केवल “संस्कारी और आज्ञाकारी नारी”, “विद्रोही नारी” या “बेचारी नारी” की सीमाओं में नहीं बँधा है। एक सशक्त व्यक्तित्व इन सभी परिभाषाओं से परे होता है।
वास्तविक स्वतंत्र जीवन तब संभव होता है जब आप प्रशंसा और उपेक्षा — दोनों के जाल से मुक्त हों। जब आपके भीतर सवाल करने का साहस हो। जब आप हर “क्यों” का उत्तर खोजने की क्षमता रखती हों। क्योंकि परिपक्वता केवल आदेश मानने या विरोध करने में नहीं, बल्कि समझने, विचार करने और अपने विवेक से निर्णय लेने में होती है।
हर स्थिति और परिस्थिति को समझना, उसका निष्पक्ष आकलन करना और स्वयं किसी निष्कर्ष तक पहुँचना — यही एक स्वतंत्र व्यक्तित्व की पहचान है। अपने दृष्टिकोण को विकसित करना और उस पर विश्वास करना ही वास्तविक स्वतंत्रता का अनुभव कराता है।
जब हम किशोरावस्था से ही हर बात के पीछे के उद्देश्य को समझने और हर घटना का चारों ओर से विश्लेषण करने का अभ्यास करने लगते हैं, तब धीरे-धीरे हमारा व्यक्तित्व आत्मविश्वासी और स्वतंत्र बनने लगता है। यही अभ्यास हमें भीड़ की सोच से अलग अपनी समझ विकसित करना सिखाता है।
व्यस्क होने तक यह समझ हमारे भीतर एक ऐसे व्यक्तित्व का निर्माण करती है जो केवल दूसरों के निर्देशों पर नहीं चलता, बल्कि अपने विवेक, अनुभव और विचारों के आधार पर निर्णय लेना जानता है। क्योंकि हमारे फैसले ही हमारे जीवन की दशा और दिशा तय करते हैं। वे ही यह निर्धारित करते हैं कि हम परिस्थितियों के अनुसार बहेंगे या अपने जीवन का मार्ग स्वयं बनाएँगे।
यह भी समझना आवश्यक है कि मानव स्वभाव संग्रह करने वाला है — वस्तुओं का भी और इंसानों का भी। कोई औलाद के रूप में संजोता है, कोई मित्रों के रूप में, और कोई अपने प्रभाव क्षेत्र के रूप में। इंसान को दूसरे इंसान पर अधिपत्य स्थापित करने में एक प्रकार के आनंद की अनुभूति होती है। इससे व्यक्ति को स्वयं के शक्तिशाली होने का एहसास होता है। उस क्षण उसके भीतर सुख और संतुष्टि के रसायन सक्रिय होने लगते हैं, और फिर वह उसी स्थिति को बनाए रखने के लिए हर संभव प्रयास करता है — चाहे वह रिश्तों में हो, परिवार में, प्रेम में, मित्रता में या समाज में।
यदि ध्यान से अपने आसपास के संबंधों को देखें, तो पाएँगे कि कहीं न कहीं हर व्यक्ति किसी न किसी के प्रभाव में जी रहा है। ज़रा ठहरकर स्वयं से पूछिए — आपने अपने जीवन की लगाम किसे सौंप रखी है? माता-पिता को, पति को, मित्रों को, प्रशंसकों को, या फिर अपने विरोधियों को?
किसी के पीछे-पीछे चलते रहना, केवल स्वीकार किए जाने के लिए जीना, या दूसरों की स्वीकृति पर अपनी दिशा तय करना — यह विवेक नहीं है। यह उस हवा को महसूस करने से वंचित रह जाना है, जो केवल तब महसूस होती है जब आप स्वयं आगे चलना चुनते हैं।
स्वतंत्र जीवन का अर्थ अकेले हो जाना नहीं, बल्कि अपने निर्णय स्वयं लेने का साहस रखना है। अपने जीवन की लगाम अपने हाथ में होना, अपने फैसलों की जिम्मेदारी लेना, और उनके परिणामों का श्रेय या सीख — दोनों स्वयं स्वीकार करना ही वास्तविक परिपक्वता है।
क्योंकि अंततः आपका जीवन आपकी अपनी यात्रा है, और उसका मार्ग भी आपको ही तय करना है।
सुनीता धारीवाल 

रजोनिवृत्ति और स्त्री शरीर की बदलती गंध


स्त्री शरीर केवल मांस और रक्त का ढांचा नहीं होता, वह प्रकृति की एक सूक्ष्म और जीवंत रचना है। उसके भीतर होने वाले परिवर्तन केवल दिखाई नहीं देते, बल्कि महसूस भी किए जाते हैं। रजोनिवृत्ति अर्थात menopause ऐसी ही एक गहन जैविक प्रक्रिया है, जिसमें स्त्री का शरीर धीरे-धीरे एक नए संतुलन की ओर बढ़ता है। इस परिवर्तन के दौरान शरीर में अनेक सूक्ष्म बदलाव आते हैं — त्वचा, भावनाओं, नींद, ऊर्जा और यहाँ तक कि शरीर की प्राकृतिक गंध में भी।
अक्सर इस विषय पर खुलकर बात नहीं होती, लेकिन अनेक महिलाएँ यह अनुभव करती हैं कि रजोनिवृत्ति के बाद उनके शरीर की गंध बदलने लगती है। पसीने की गंध, त्वचा की महक, यहाँ तक कि मूत्र की गंध भी पहले जैसी नहीं रहती। कई बार यह गंध कुछ भारी, तीखी या पुरुषों जैसी प्रतीत होने लगती है। यह कोई भ्रम नहीं, बल्कि हार्मोन में आए बदलावों का स्वाभाविक परिणाम है।
युवावस्था में स्त्री शरीर में एस्ट्रोजन और अन्य प्रजनन हार्मोन सक्रिय रहते हैं। यही हार्मोन त्वचा की कोमलता, नमी और शरीर की उस विशिष्ट प्राकृतिक गंध को बनाए रखते हैं जिसे कई महिलाएँ एक मादक, सौम्य और स्त्रियोचित महक के रूप में अनुभव करती हैं। यह गंध इतनी स्वाभाविक होती है कि यौवन में हम उसे अलग से महसूस नहीं कर पाते, क्योंकि वह हमारे अस्तित्व का सहज हिस्सा बन चुकी होती है।
लेकिन जैसे-जैसे रजोनिवृत्ति की प्रक्रिया आरंभ होती है, हार्मोनल संतुलन बदलने लगता है। त्वचा शुष्क होने लगती है, पसीने की संरचना बदलती है, शरीर के बैक्टीरिया का संतुलन प्रभावित होता है और शरीर की रासायनिक प्रक्रिया भी धीरे-धीरे परिवर्तित होने लगती है। परिणामस्वरूप शरीर की प्राकृतिक गंध भी बदल जाती है। यह परिवर्तन अचानक नहीं आता, बल्कि वर्षों में धीरे-धीरे विकसित होता है।
यह अनुभव केवल शारीरिक नहीं, भावनात्मक भी होता है। कई महिलाएँ अपने भीतर एक अनकहा परिवर्तन महसूस करती हैं — जैसे शरीर अपनी पुरानी पहचान से आगे बढ़ रहा हो। यह परिवर्तन कभी असहज कर सकता है, तो कभी आत्मचिंतन का कारण बन जाता है। परंतु इसे किसी कमी या विकार की तरह देखने के बजाय जीवन के स्वाभाविक चरण के रूप में समझना अधिक आवश्यक है।
स्त्री का सौंदर्य केवल उसकी युवा देह या हार्मोनों में नहीं होता। हर आयु में उसका शरीर एक नई कहानी कहता है। रजोनिवृत्ति के बाद बदलती हुई गंध भी उसी कहानी का एक हिस्सा है — यह संकेत है कि शरीर एक नए अध्याय में प्रवेश कर रहा है।
हाँ, यदि गंध में अचानक बहुत अधिक परिवर्तन हो, तीव्र दुर्गंध, संक्रमण, जलन या अन्य असामान्य लक्षण हों, तो चिकित्सकीय सलाह लेना आवश्यक है। लेकिन सामान्य और धीरे-धीरे होने वाले परिवर्तन जीवन की स्वाभाविक जैविक यात्रा का हिस्सा हैं।
रजोनिवृत्ति अंत नहीं, बल्कि स्त्री शरीर का एक नया रूपांतरण है — शांत, परिपक्व और गहराई से भरा हुआ।
सुनीता धारीवाल 

शनिवार, 30 मई 2026

मृत्यु नहीं, महायात्रा

मृत्यु नहीं, महायात्रा
मनुष्य की जिज्ञासा ने उसे मंगल तक पहुँचा दिया है। जब हम बच्चे थे, तब जिज्ञासा होती थी कि बड़े होकर कैसे दिखेंगे, क्या बनेंगे। अब जब अधेड़ उम्र भी पार होने लगी है, तो मन में एक नया प्रश्न उठता है—हम कब और कैसे मरेंगे?
यह एक बड़ा रहस्य है। हम नहीं जानते कि हमारी मृत्यु कब, कहाँ और कैसे होगी। बस इतना तय है कि एक दिन जाना सबको है। पके फलों का गिरना उत्सव है, कच्चे फलों का गिरना मातम। और हम शायद अब पके और ज़्यादा पके के बीच कहीं खड़े हैं।
गिरना तो है, पर कब? अपना पूरा समय लेकर या किसी आंधी-तूफान के पहले ही झोंके में? यह कोई नहीं जानता।
स्वर्ग-नरक, हेवन-हेल, जन्नत-दोज़ख—इन धारणाओं पर मेरा विश्वास नहीं है। शायद इसी कारण मुझे मृत्यु से भय नहीं लगता। हाँ, कौतूहल अवश्य है। मुझे लगता है कि मृत्यु के बाद मैं इस विराट ब्रह्मांड के मूल तत्वों में विलीन हो जाऊँगी और मेरी कॉस्मिक यात्राएँ आरम्भ होंगी। मैं अलग-अलग आकाशगंगाओं और ब्रह्मांडों में पर्यटन करूँगी—बिना एक पैसा खर्च किए।
हम इसी ब्रह्मांड के तत्वों से बने हैं और अंततः वहीं लौट जाना है। खुशी-खुशी।
विज्ञान भी आज यही कहता है कि हमारे शरीर के अधिकांश परमाणु उन्हीं तारों के भीतर बने थे जिनसे ग्रह और आकाशगंगाएँ बनीं। कार्बन, ऑक्सीजन, नाइट्रोजन, कैल्शियम और फॉस्फोरस—ये सभी तत्व किसी समय तारों के हृदय में जन्मे थे। प्रसिद्ध खगोलशास्त्री कार्ल सगन ने कहा था—
"हम तारों की धूल से बने हैं।"
भारतीय दर्शन ने इसे सदियों पहले ही कह दिया था—"यथा पिंडे तथा ब्रह्माण्डे।"
मानव शरीर की राख और ग्रहों की धूल एक जैसी नहीं होती, पर दोनों के मूल तत्व एक ही ब्रह्मांडीय स्रोत से आते हैं। यह विचार मुझे आकर्षित करता है। शायद इसलिए कि इसमें अलगाव नहीं, एकत्व का बोध है।
मुझे ब्रह्मांड से प्रेम है। आसमान की ओर ताकना मेरा प्रिय शगल है। मैं घंटों तारों को निहार सकती हूँ। उनसे बातें करती हूँ। मुझे लगता है कि वे मेरी बातें सुनते हैं।
और एक दिन मैं भी उड़ते-बहते कणों में बदलकर इन्हीं के बीच चली जाऊँगी। अपने मूल में लौटने का विचार मुझे भय नहीं, उत्साह देता है। शरीर की यात्रा पूरी होगी तभी तो महायात्रा आरम्भ होगी।
मेरा यह मानना कि स्वर्ग-नरक जैसी कोई व्यवस्था नहीं है, मुझे मृत्यु के भय से मुक्त करता है। हम सूर्य-पूजक सभ्यता के लोग हैं। हमारे भीतर जो ऊर्जा का प्रकाश है, वह कभी मरता नहीं—बस रूप बदलता है।
इसलिए यहीं, इसी जीवन में, अच्छे कर्म करते चलो। बिना इस चिंता के कि यमराज के बही-खाते में दया, करुणा, दान और पुण्य दर्ज हो रहे हैं या नहीं। अच्छाई का मूल्य किसी परलोक के पुरस्कार में नहीं, बल्कि इसी जीवन की सार्थकता में है।
अरबों वर्षों से यह यात्रा चल रही है और आगे भी चलती रहेगी—निर्विघ्न, निरंतर।
बस जीवन का आनंद लो।
मौज लो, रोज़ लो। ना मिले तो खोज लो।

सुनीता धारीवाल

The Cosmic Homecoming


The Cosmic Homecoming
Reflections on Mortality, Stardust, and the Journey Back to the Universe
Human curiosity has carried us from caves to the Moon and onward to Mars. As children, our questions were simple and personal: What will I become? What will I look like when I grow up?
As the years pass and middle age slowly gives way to later life, a different question begins to emerge: When will I die, and how?
Death remains one of humanity's greatest mysteries. None of us knows when, where, or in what manner it will arrive. We know only that it will. The falling of ripe fruit is accepted as part of nature's rhythm; the falling of unripe fruit feels like a tragedy. Many of us, perhaps, now find ourselves somewhere between ripe and overripe.
Fall we must. The only uncertainty is whether we will complete our season or be carried away by the first gust of an unexpected storm.
Yet I do not fear death.
Not because I possess answers, but because I am fascinated by the mystery itself.
I do not believe in Heaven or Hell, Paradise or Damnation. For me, death is not a doorway to reward or punishment. It is a return—a homecoming. The thought brings not fear but curiosity. I imagine myself dissolving back into the vast fabric of the cosmos, becoming part of the same universe from which I emerged.
Perhaps then my greatest journey will begin.
I will travel among stars, galaxies, and worlds beyond imagination, not as a tourist carrying luggage, but as a fragment of the universe itself. No tickets. No passports. No expense. Only an endless voyage through existence.
After all, we are made from the elements of the universe, and one day we shall return to them.
Modern science has revealed something extraordinary. The atoms that form our bodies were forged in ancient stars billions of years ago. The carbon in our cells, the oxygen we breathe, the calcium in our bones, and the phosphorus that sustains life were all created in stellar furnaces long before Earth was born.
The astronomer Carl Sagan expressed it beautifully:
"We are made of star-stuff."
Long before telescopes and spectrographs confirmed this truth, Indian philosophy hinted at a similar understanding: as is the individual, so is the cosmos. The microcosm reflects the macrocosm.
Human ashes and cosmic dust are not chemically identical, yet they share a common ancestry. The elements that remain after our bodies return to the Earth were themselves born in dying stars and ancient explosions of unimaginable power.
I find this idea deeply comforting.
It tells us that we are not strangers in the universe. We belong to it.
I have always been fascinated by the night sky. Looking upward is one of my favorite occupations. I can spend hours watching the stars. Sometimes I speak to them. It may sound foolish, but I often feel that they are listening.
Perhaps they are.
One day I too will become part of that celestial conversation. I will drift as particles and energy among the same stars I have spent a lifetime admiring. The thought fills me not with sadness but with anticipation.
The journey of the body must end so that a greater journey may begin.
I come from a culture that has long revered the Sun. We have always understood, in one form or another, that energy does not truly disappear. It transforms. The light within us changes its shape but not its essence.
That belief frees me from the fear of death.
And so I try to live simply: to do good, to be kind, to offer compassion when I can—not because I imagine some celestial accountant recording my deeds in a cosmic ledger, but because goodness enriches life itself.
A meaningful life requires no promise of reward.
For billions of years, matter and energy have been traveling through the cosmos, continuously changing form. Stars become dust. Dust becomes planets. Planets give rise to life. Life reflects upon the stars from which it came.
And the journey continues.
Unbroken.
Eternal.
We are all participants in that magnificent voyage.
So enjoy life.
Take delight in ordinary days.
Find wonder in the sky above you and kindness in the people around you.
And if joy is not readily found, go searching for it.
For we have been travelers for billions of years, and our journey is far greater than we can imagine.
Death is not the end of the story.
It is simply the cosmic homecoming.
— Sunita Dhariwa