मानव समाज अत्यंत रोचक है। पूरे विश्व में मानव कबीलों ने साथ-साथ, समूहों और झुंडों में रहते हुए अपनी-अपनी मान्यताएँ, परंपराएँ और रीति-रिवाज विकसित किए। हर रीति-रिवाज के पीछे कोई न कोई वजह, अनुभव और सामाजिक उद्देश्य छिपा होता है। आज इन्हीं विषयों पर कुछ रोचक चर्चा करते हैं।
सबसे पहले इनके शाब्दिक अर्थ समझते हैं।
‘रीति’ का अर्थ है — पद्धति और ‘रिवाज’ का अर्थ है — चलन।
अर्थात किसी विशेष कर्म को करने की वह पद्धति जो लंबे समय से लगातार चली आ रही हो।
‘परंपरा’ शब्द संस्कृत भाषा से आया है, जिसका शाब्दिक अर्थ है — बिना व्यवधान के किसी श्रृंखला या क्रम का निरंतर जारी रहना।
यानि कुछ ऐसे कर्म और व्यवहार जो पीढ़ी दर पीढ़ी बिना अधिक सवाल किए लगातार निभाए जाते रहे हों।
आज के युग में, जहाँ इंसान मंगल ग्रह पर कॉलोनी बसाने के रास्ते खोज रहा है, अंतरिक्ष पर्यटन की सुविधाएँ विकसित कर रहा है, वहीं वह सदियों पुरानी परंपराओं को भी उसी श्रद्धा और निरंतरता से निभाता चला आ रहा है।
मनुष्य वास्तव में एक अत्यंत रोचक सामाजिक प्राणी है। वह हमेशा व्यस्त रहता है — कुछ नया रचने में, कुछ पुराना सँजोए रखने में। वह भविष्य की ओर दौड़ता है, लेकिन अपनी स्मृतियों और संस्कारों को भी साथ लेकर चलता है।
हर समाज में मनुष्य का जन्म और मरण दो सबसे बड़ी घटनाएँ मानी जाती हैं, और इनके बीच का जीवन उत्सवों, मेलों और संस्कारों से भरा होता है। सदियों से मानव समाज ने शोक से अधिक उत्सवों को महत्व दिया है। यही कारण है कि हमें मानव सभ्यता के निशान कलाओं, परंपराओं, लोकगीतों और मान्यताओं में गहराई से उकेरे हुए मिलते हैं।
दुनिया भर में अनेक रोचक और रोमांचक रीतियाँ प्रचलित हैं। भारतीय समाज में भी मनुष्य के जन्म से लेकर मरण तक अनेक संस्कार पाए जाते हैं। इसके अतिरिक्त ऋतुओं, खेती, विवाह, पर्वों और सामाजिक संबंधों से जुड़े भी अनेक रिवाज हैं। पर आज हम विशेष रूप से हरियाणा प्रदेश के रीति-रिवाजों की चर्चा करेंगे।
हरियाणा, जो सिंधु घाटी सभ्यता की जीवित विरासत माना जाता है, वहाँ की परंपराएँ भारतीय सभ्यता के प्रारंभिक हस्ताक्षरों की तरह आज भी जीवित दिखाई देती हैं। यहाँ के लोकगीत, खान-पान, विवाह संस्कार, खेती से जुड़े उत्सव और पारिवारिक परंपराएँ अपने भीतर सदियों पुरानी सांस्कृतिक स्मृतियाँ सँजोए हुए हैं।
हरियाणा के गाँवों में आज भी अनेक रिवाज केवल परंपरा नहीं, बल्कि सामाजिक संबंधों को मजबूत रखने का माध्यम हैं। विवाह में गाए जाने वाले बन्ने-बन्नी के गीत, तीज और सावन के झूले, फसल कटाई के बाद सामूहिक उत्सव, नवजात शिशु के जन्म पर होने वाले संस्कार, और मृत्यु के बाद सामूहिक शोक प्रकट करने की परंपराएँ — ये सभी केवल रस्में नहीं, बल्कि समाज को एक सूत्र में बाँधे रखने वाली सांस्कृतिक डोर हैं।
समय के साथ बहुत कुछ बदला है। डिजिटल युग ने जीवन की गति, सोच और संबंधों के स्वरूप को भी प्रभावित किया है। नई पीढ़ी अब मोबाइल स्क्रीन और वैश्विक संस्कृति के बीच बड़ी हो रही है। ऐसे समय में यह प्रश्न स्वाभाविक है कि क्या आने वाली पीढ़ियाँ इन परंपराओं को समझ पाएँगी? क्या वे इनके पीछे छिपे सामाजिक और भावनात्मक अर्थों को महसूस कर पाएँगी?
परंपराओं को ज्यों का त्यों ढोना ही आवश्यक नहीं, बल्कि उन्हें समझना और समय के अनुसार संवेदनशील रूप से आगे बढ़ाना अधिक आवश्यक है। क्योंकि कोई भी संस्कृति केवल अतीत से नहीं, बल्कि वर्तमान की समझ और भविष्य की आशा से जीवित रहती है।
परिवारों में विवाह के उत्सव के दौरान अनेक लोक-कर्म और रस्में निभाई जाती हैं। हम सभी उन्हें परंपरा मानकर करते तो हैं, पर क्या कभी ठहरकर यह पूछा है कि इन्हें क्यों किया जाता है?
और यदि कभी पूछा भी हो, तो अधिकतर यही उत्तर मिला होगा —
“बेरा ना… बड़े-बूढ़े न्यू ही करते आए, हम ने भी सीख लिया।”
विवाह उत्सव में हम अनेक कर्म करते हैं, पर उनका तर्क और उद्देश्य अक्सर समझ में नहीं आता।
ज़रा सोचिए —
विवाह की कार के टायर पर पानी क्यों डाला जाता है?
दरवाजे की चौखट पर तेल क्यों डाला जाता है?
दूल्हे को घोड़ी पर बैठाकर पूरे गाँव में क्यों घुमाया जाता है?
दूल्हा-दुल्हन पर नीम क्यों झाड़ी जाती है?
ऐसे न जाने कितने कर्म हैं, जिनका पालन तो पीढ़ियों से होता आया है, लेकिन जिनका वास्तविक कारण बहुत कम लोगों को पता है।
इन सब प्रश्नों के उत्तर समझने के लिए हमें उस समय को समझना होगा, जब ये रीति-रिवाज जन्मे थे। ये परंपराएँ उस दौर की देन हैं, जब मानव कबीले एक स्थान से दूसरे स्थान तक पलायन करते हुए अंततः स्थायी रूप से बसने लगे थे। धीरे-धीरे खेती शुरू हुई और पूरा सामाजिक तथा आर्थिक ढाँचा कृषि और श्रम आधारित जीवन पर टिका हुआ था।
उस समय विवाह केवल दो व्यक्तियों का संबंध नहीं था, बल्कि दो परिवारों, श्रम-समूहों और सामाजिक इकाइयों का जुड़ाव था। इसलिए विवाह से जुड़े अनेक कर्मों का संबंध स्वास्थ्य, सुरक्षा, सामाजिक अनुशासन, श्रम-विभाजन, प्रजनन क्षमता, सामूहिक पहचान और मनोवैज्ञानिक तैयारी से था।
समय के साथ उनके मूल कारण धुंधले पड़ गए, लेकिन रस्में बची रहीं। आज आवश्यकता केवल उन्हें निभाने की नहीं, बल्कि उन्हें समझने की भी है — ताकि हम यह जान सकें कि हमारी परंपराएँ केवल अंधविश्वास नहीं, बल्कि अपने समय की सामाजिक बुद्धिमत्ता और जीवन-अनुभवों की अभिव्यक्ति भी थीं।
खेड़ा क्यों पूजते हैं?
ईश्वर की धारणा मनुष्य के भीतर बहुत प्राचीन और व्यापक रूप से पाई जाती है। आदिकाल से मनुष्य ने प्रकृति की अनेक ऐसी घटनाओं को देखा और महसूस किया, जिन पर उसका कोई नियंत्रण नहीं था।
भूकम्प आया तो उसे लगा कोई अदृश्य शक्ति धरती को हिला रही है। तूफ़ान उठा तो लगा कोई है जो उसे बना भी रहा है और अपनी इच्छा से शांत भी कर रहा है। सूनामी, आकाशीय बिजली, सूखा, अतिवृष्टि — ऐसी अनगिनत प्राकृतिक घटनाएँ थीं, जिनके सामने मनुष्य स्वयं को असहाय महसूस करता था।
यहीं से उसके भीतर यह विश्वास जन्म लेने लगा कि कोई ऐसी शक्ति अवश्य है, जो उससे अधिक शक्तिशाली है। उसी भावना से ईश्वर की अवधारणा ने जन्म लिया। फिर उसकी आराधना, अर्चना और आह्वान की परंपराएँ विकसित होने लगीं।
“खेड़ा” भी इसी मानवीय मनोविज्ञान और सामाजिक संरचना से जुड़ी एक अवधारणा है। खेड़ा एक प्रकार का काल्पनिक या प्रतीकात्मक रक्षक देव माना गया। जब पुराने समय में कबीले एक स्थान से दूसरे स्थान पर जाकर बसते थे, तब वे सबसे पहले किसी निश्चित स्थान पर ईंटों या मिट्टी से उस रक्षक देव की स्थापना करते थे। उसके बाद धीरे-धीरे वहाँ पूरा गाँव बसता था।
वह स्थान केवल पूजा का केंद्र नहीं होता था, बल्कि सामूहिक सुरक्षा, विश्वास और एकता का प्रतीक बन जाता था। गाँव में कोई नया व्यक्ति आता — चाहे वह नवजात शिशु हो, विवाह के बाद आने वाली दुल्हन हो, या कोई अन्य व्यक्ति जो पलायन करके उस गाँव में स्थायी रूप से बसना चाहता हो — वह खेड़ा देव को प्रणाम कर स्वयं को उस समुदाय का हिस्सा मानता था।
इस प्रकार खेड़ा केवल धार्मिक प्रतीक नहीं था, बल्कि सामुदायिक स्वीकृति और संरक्षण का प्रतीक भी था।
यह परंपरा आज भी अनेक गाँवों में जीवित है। इसके मूल में मनुष्य का उस शक्ति के प्रति समर्पण, सुरक्षा की चाह और सामूहिक विश्वास छिपा हुआ है, जिसे वह स्वयं से अधिक शक्तिशाली मानता आया है।
बनड़ा या बनड़ी को घर से बाहर जाने की मनाही — मटणा लगाना और तेल चढ़ाना
विवाह से पहले दूल्हे या दुल्हन को कुछ दिनों तक घर से बाहर न जाने देना, मटणा लगाना, तेल चढ़ाना जैसी रस्में आज भले केवल परंपरा या उत्सव का हिस्सा लगती हों, लेकिन इनके पीछे उस समय की जीवनशैली और व्यावहारिक समझ छिपी हुई थी।
पुराने समय में जीवन पूरी तरह कृषि आधारित था। खेतों में कठिन श्रम करना पड़ता था और धूप, मिट्टी तथा मौसम का सीधा प्रभाव शरीर और त्वचा पर पड़ता था। लगातार खुले वातावरण में काम करने से त्वचा पर टैनिंग, रूखापन और कई बार संक्रमण भी हो जाते थे।
ऐसे में विवाह जैसे बड़े उत्सव से पहले दूल्हे और दुल्हन को कुछ दिनों तक घर के भीतर या छाँव में रखा जाता था, ताकि शरीर को आराम मिले और त्वचा धूप से बची रहे। इसी दौरान उन पर हल्दी, तेल और विभिन्न जड़ी-बूटियों का मिश्रण लगाया जाता था। कई दिनों तक लगातार उबटन और तेल से मालिश कर नहलाने की प्रक्रिया चलती थी।
इससे खेतों की धूप से हुई टैनिंग कम होती, त्वचा मुलायम और कांतियुक्त बनती, और हल्दी अपने प्राकृतिक गुणों से त्वचा के संक्रमणों को भी दूर करती थी। हल्दी उस समय का प्राकृतिक एंटीसेप्टिक और सौंदर्य प्रसाधन दोनों थी।
तेल क्यों चढ़ाया और उतारा जाता है?
दूल्हा और दुल्हन की त्वचा में नमी बनाए रखने के लिए शरीर पर तेल लगाया जाता था। तेल की मालिश से शरीर को आराम मिलता था और त्वचा को पोषण मिलता था। परिवार की महिलाएँ बारी-बारी से यह कार्य करती थीं। यह केवल रस्म नहीं, बल्कि अपनापन और स्नेह का प्रतीक भी था।
तेल लगाने के बाद दही का प्रयोग उसकी अतिरिक्त चिकनाई को संतुलित करने के लिए किया जाता था। दही त्वचा को ठंडक देता था और उसे साफ व कोमल बनाता था। बालों को भी दही से धोया जाता था, जिससे वे मुलायम, स्वच्छ और चमकदार बनते थे।
आज जिस प्रकार लोग महंगे स्किन और हेयर ट्रीटमेंट करवाते हैं, उस समय यही घरेलू उपाय प्राकृतिक सौंदर्य प्रसाधन का कार्य करते थे। उस दौर में पानी की उपलब्धता भी सीमित थी। रोज़ स्नान करना हर किसी के लिए संभव नहीं था, इसलिए विवाह के अवसर पर दूल्हे को विशेष रूप से स्नान, मालिश और सजने-सँवरने का अवसर मिलता था। ऐसे में चेहरे पर चमक आना स्वाभाविक था।
फिर सुंदर वस्त्र, आभूषण और श्रृंगार दूल्हा-दुल्हन को सबसे अलग और आकर्षक बना देते थे। पूरे उत्सव का केंद्र वही होते थे। सबकी निगाहें उन्हीं पर टिकती थीं — ठीक वैसे ही जैसे आज किसी सेलिब्रिटी पर होती हैं।
स्वागत में दरवाजे पर तेल चढ़ाना, गाड़ी के टायर पर पानी डालना और तेल चढ़ाना
पुराने समय में बारातें मोटर कारों से नहीं, बल्कि बैलगाड़ियों, रथों और लकड़ी की मंझोलियों पर जाया करती थीं। उन गाड़ियों के पहिये भी लकड़ी के होते थे। लंबी यात्राओं के दौरान रास्ते की मिट्टी, कीचड़ और धूल पहियों में भर जाती थी। लगातार चलने से पहियों की धुरी में लगी चिकनाई भी समाप्त होने लगती थी।
उस दौर में यह एक सामान्य सामाजिक आचरण था कि मेहमान की गाड़ी के पहियों को पानी से धोया जाए और उसकी धुरी में तेल या चिकनाई डाली जाए। यह केवल सम्मान का प्रतीक नहीं था, बल्कि अतिथि की वास्तविक सहायता भी थी, ताकि उसकी वापसी की यात्रा सुगम हो सके।
धीरे-धीरे यही व्यवहार परंपरा बन गया। समय बदला, बैलगाड़ियों की जगह मोटर कारों ने ले ली, लेकिन सम्मान की वह भावना आज भी बनी हुई है। इसलिए आज भी विवाह में दूल्हे की कार के टायर पर पानी डालना और तेल लगाना उसी पुरानी परंपरा का आधुनिक रूप है।
पुराने समय में गाँव, कुनबे या बस्तियों के बड़े-बड़े मुख्य दरवाजे हुआ करते थे। वे भारी लकड़ी के बने होते थे और रोज़मर्रा में कम ही खोले जाते थे। जब कोई रथ, बैलगाड़ी या बड़ा वाहन भीतर आता, तभी वह मुख्य द्वार खोला जाता था। उसी बड़े दरवाजे में एक छोटा दरवाजा भी बना होता था, जिससे आम लोगों का आना-जाना होता था।
बड़े दरवाजे भारी होने के कारण उनकी चूलों और कुंडों में समय-समय पर तेल डालना आवश्यक होता था, ताकि वे आसानी से खुल-बंद हो सकें। विवाह के अवसर पर जब बारात के रथ और बैलगाड़ियाँ भीतर लाई जाती थीं, तब उस मुख्य द्वार की चूलों में तेल डाला जाता था।
आज भले ही वैसी विशाल चौपालें और किले जैसे दरवाजे नहीं रहे, लेकिन परंपरा अभी भी जीवित है। अब हम प्रतीक स्वरूप अपने घर के दरवाजे पर तेल चढ़ाते हैं और बिना जाने उस पुरानी सामाजिक स्मृति को निभाते चले आते हैं।
और हाँ, एक रोचक बात यह भी है कि हरियाणा में बैलगाड़ियों में तेल का प्रयोग बहुत बाद में शुरू हुआ। उससे पहले रथों और बैलगाड़ियों की धुरी पर पटसन — जिसे हरियाणा में “सण” कहा जाता है — उसके रेशों पर मक्खन लगाकर कई परतों में लपेटा जाता था। यही मक्खन पहियों की धुरी को पूरे सफर में चिकनाई देता था, ताकि पहिये आसानी से घूमते रहें।
यानी तेल आने से पहले हरियाणा में पहियों को भी मक्खन नसीब होता था। यही तो है असली “दूध-दही वाला हरियाणा”।
दुल्हे को सजा कर गाँव में क्यों घुमाया जाता है?
दूल्हे को सजा-धजाकर घोड़ी या रथ पर बैठाकर गाँव में घुमाने की परंपरा केवल उत्सव और दिखावे के लिए नहीं थी, बल्कि उसके पीछे गहरा सामाजिक उद्देश्य छिपा हुआ था।
पुरातन समय से ही विवाह केवल दो व्यक्तियों का निजी संबंध नहीं, बल्कि एक सामाजिक क्रिया माना जाता था, जिसमें पूरे समुदाय की उपस्थिति और भागीदारी आवश्यक होती थी। उस समय समाज सामूहिक जीवन पर आधारित था, इसलिए किसी भी विवाह को सामाजिक स्वीकृति मिलना महत्वपूर्ण माना जाता था।
बारात चढ़ने से एक दिन पहले दूल्हे को सजाकर गाँव की गलियों से होते हुए देव-पूजा या खेड़ा पूजा के लिए ले जाया जाता था। यह एक प्रकार की सार्वजनिक घोषणा होती थी कि अमुक युवक अब विवाह बंधन में बंधने जा रहा है।
इस परंपरा का उद्देश्य पूरे गाँव और समुदाय को यह जानकारी देना था कि अब इस युवक का रिश्ता सामाजिक रूप से स्वीकार किया जा रहा है। यह केवल परिवार का निर्णय नहीं, बल्कि पूरे समाज की जानकारी और सहमति से होने वाला संबंध माना जाता था।
गाँव के लोग दूल्हे को देखते, आशीर्वाद देते और विवाह उत्सव में अपनी सहभागिता सुनिश्चित करते थे। इस प्रक्रिया से सामाजिक संबंध मजबूत होते थे और विवाह केवल दो लोगों का नहीं, बल्कि दो परिवारों और पूरे समुदाय का उत्सव बन जाता था।
दूल्हा-दुल्हन पर नीम क्यों झारते हैं?
विवाह उत्सव में दूल्हा और दुल्हन दोनों ही यात्रा करके एक स्थान से दूसरे स्थान पर पहुँचते थे। पुराने समय में यह सफर पैदल, बैलगाड़ियों या रथों से लंबी दूरी तय करके किया जाता था। ऐसे सफर में वे अलग-अलग वातावरण, धूल-मिट्टी और अनेक लोगों के संपर्क में आते थे। स्वाभाविक रूप से जीवाणुओं और विषाणुओं के संपर्क में आने की संभावना भी बढ़ जाती थी।
इसी कारण दूल्हा और दुल्हन के स्वागत के समय नीम का प्रयोग किया जाता था। नीम की टहनियों को उनके ऊपर झारा जाता था, ताकि यह एक पारंपरिक संक्रमण-रोधी उपाय का कार्य करे।
भारतीय लोकजीवन में नीम को केवल एक पेड़ नहीं, बल्कि प्राकृतिक सुरक्षा कवच माना गया है। नीम में जीवाणुरोधी और वातावरण को शुद्ध रखने वाले गुण पाए जाते हैं। गाँवों में आज भी नीम को घरों, चौपालों और आँगनों के आसपास इसलिए लगाया जाता है, क्योंकि उसकी उपस्थिति वातावरण को स्वच्छ और सुरक्षित बनाए रखने में सहायक मानी जाती है।
विवाह जैसे बड़े सामूहिक आयोजनों में, जहाँ बाहर से अनेक लोग आते-जाते थे, वहाँ नीम का प्रयोग स्वास्थ्य सुरक्षा की लोक समझ का हिस्सा था। चाहे दूल्हे का स्वागत हो या नई दुल्हन का गृह प्रवेश — नीम की उपस्थिति को सुनिश्चित किया जाता था।
समय के साथ यह एक रस्म बन गई, लेकिन उसके मूल में लोक जीवन का स्वास्थ्य विज्ञान और प्राकृतिक उपचार की समझ छिपी हुई थी।
परंपराएँ बदलती हैं, प्रतीक रह जाते हैं
विवाह संस्कारों से जुड़े ऐसे अनेक विधान और लोकाचार हैं, जिन्हें हम अपने परिवारों और समाज में आज भी निभाते आ रहे हैं। कंगना खेलना, सांटे मारना, दुल्हन की गोद में देवर को बैठाना, दूल्हे की माँ द्वारा पानी वारना, मिणती करना और ऐसी न जाने कितनी रस्में हैं, जिनका संबंध कभी सामाजिक संरचना, पारिवारिक मनोविज्ञान, स्वास्थ्य, श्रम-विभाजन और लोकजीवन की व्यावहारिक समझ से रहा होगा।
समय के साथ उनके मूल कारण धुंधले पड़ गए, लेकिन रस्में आज भी जीवित हैं। कुछ परंपराएँ हमें भावुक करती हैं, कुछ मनोरंजक लगती हैं और कुछ ऐसी भी हैं, जो आज की दृष्टि से चौंकाती हैं।
इस एक लेख में सभी रस्मों और उनके पीछे छिपे अर्थों को समेट पाना संभव नहीं है, इसलिए उन्हें श्रृंखलाबद्ध लेखों में शामिल करूँगी।
बहरहाल, आप भी मुझे लिख भेजिए कि आपके यहाँ कौन-कौन सी ऐसी रस्में हैं, जो आपको सबसे अधिक रोचक, रहस्यमयी या चौंकाने वाली लगती हैं। मैं उन्हें आगे के लेखों में अवश्य शामिल करने का प्रयास करूँगी।
और हाँ, चलते-चलते एक ऐसी रस्म भी याद दिलाती हूँ, जो आज के समय में बहुत लोगों को अजीब या असहज लग सकती है। कुछ स्थानों पर दूल्हा बारात चढ़ने से पहले प्रतीकात्मक रूप से अपनी माँ के स्तन को होंठ लगाता है।
इस रस्म की जड़ें उस समय में हैं, जब बाल-विवाह सामान्य थे। उस दौर में बहुत कम उम्र के बच्चों का विवाह कर दिया जाता था। कई बार बच्चे वास्तव में अभी माँ का दूध पीने की अवस्था में ही होते थे और विवाह के बाद उन्हें माँ की गोद से विदा किया जाता था। समय बदला, बाल-विवाह कम हुए, दूल्हों की उम्र बढ़ी, लेकिन रस्म प्रतीकात्मक रूप में कई स्थानों पर बनी रही। आज भी कुछ जगहों पर वयस्क दूल्हे इस परंपरा को केवल सांकेतिक रूप में निभाते दिखाई दे जाते हैं।
यही परंपराओं की सबसे रोचक बात है — समय बदल जाता है, अर्थ बदल जाते हैं, लेकिन प्रतीक कई बार सदियों तक जीवित रहते हैं।
शेष अगली कड़ी में…
सुनीता धारीवाल
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