रविवार, 31 मई 2026

क्या समाज सचमुच बदल गया है?




क्या समाज सचमुच बदल गया है?

कई बार हम मान लेते हैं कि समाज बदल गया है। लड़कियाँ पढ़ रही हैं, काम कर रही हैं, व्यवसाय कर रही हैं, निर्णय ले रही हैं। ऊपर से देखने पर सब कुछ आधुनिक दिखाई देता है। लेकिन कभी-कभी कोई छोटी-सी घटना हमें याद दिला देती है कि बदलाव जितना दिखाई देता है, उतना गहरा अभी नहीं हुआ है।

मैं एक छोटी उद्यमी हूँ। मेरा व्यवसाय बहुत बड़ा नहीं है, लेकिन उससे अनेक महिलाओं को काम मिलता है। मेरे लिए काम केवल पैसे कमाने का माध्यम नहीं है। सच कहूँ तो काम मेरी आदत है, मेरा जुनून है और शायद मेरे व्यक्तित्व का एक अभिन्न हिस्सा भी है।

मैं उन लोगों में से हूँ जिन्हें कुछ नया सीखने, कुछ नया बनाने और कुछ नया करने से खुशी मिलती है। जब मैं किसी नए विचार को आकार देती हूँ, कोई नया उत्पाद तैयार करती हूँ या किसी रचनात्मक समस्या का समाधान खोजती हूँ, तो मुझे एक विशेष प्रकार की संतुष्टि मिलती है। काम न करूँ तो बेचैनी महसूस होती है, लेकिन काम करते हुए मैं स्वयं को जीवंत महसूस करती हूँ।

मेरे लिए यह केवल व्यक्तिगत संतुष्टि का विषय भी नहीं है। मेरे साथ अनेक महिलाएँ जुड़ी हुई हैं। उनकी आय से किसी के बच्चों की फीस भरती है, किसी के घर का राशन आता है, कोई किराया चुकाती है, कोई अपनी आर्थिक स्वतंत्रता की ओर एक कदम बढ़ाती है। जब मेरे काम से किसी और के जीवन में भी सकारात्मक परिवर्तन आता है, तब मेरे प्रयासों का अर्थ और गहरा हो जाता है।

लेकिन इसी यात्रा में मुझे समाज की एक ऐसी परत दिखाई दी, जिसके बारे में मैं सोचती थी कि शायद अब वह समाप्त हो चुकी है।

एक दिन मुझे कहा गया—

"आपको शर्म नहीं आती हमारे भाई की सार्वजनिक रूप से तौहीन करते हुए? भाई की इज़्ज़त का कुछ तो ख़याल करो।"

मैं कुछ क्षणों के लिए बिल्कुल समझ ही नहीं पाई कि मुझसे यह बात क्यों कही जा रही है।

मैं अपने पति का जितना सम्मान करती हूँ, शायद उसे शब्दों में पूरी तरह व्यक्त नहीं कर सकती। उन्होंने हमेशा मेरी स्वतंत्रता की रक्षा की है, मेरे निजी निर्णयों का सम्मान किया है और मुझे अपने व्यक्तित्व के साथ विकसित होने की पूरी स्वतंत्रता दी है। ऐसे जीवनसाथी हर किसी को नहीं मिलते।

पहले तो मुझे लगा कि शायद कोई गलतफहमी हुई है। फिर धीरे-धीरे समझ आया कि यह टिप्पणी मेरे व्यवसाय को लेकर थी।

कुछ समय पहले मैंने सोशल मीडिया पर एक रील बनाई थी, जिसमें मैं स्वयं अपने उत्पादों के बारे में बता रही थी। मेरे लिए यह अपने काम को लोगों तक पहुँचाने का एक साधारण प्रयास था। लेकिन कुछ लोगों ने उसे बिल्कुल अलग नज़रिए से देखा।

मुझे धीरे-धीरे समझ आया कि वे मेरे काम को उद्यमिता की तरह नहीं देख रहे थे। वे उसे आर्थिक आवश्यकता के संकेत की तरह देख रहे थे। उनके लिए यह कल्पना करना कठिन था कि कोई महिला केवल अपने काम से प्रेम के कारण, कुछ नया बनाने की खुशी के कारण, या अपने व्यवसाय को आगे बढ़ाने के लिए स्वयं सामने आकर अपने उत्पादों का प्रचार कर सकती है।

उनकी नज़र में यदि पत्नी स्वयं सामान बेच रही है, तो इसका अर्थ यह है कि पति पर्याप्त नहीं कमा रहा। और यही सोच उन्हें मेरे पति की "इज़्ज़त" से जुड़ी दिखाई देती थी।

उस क्षण मुझे पहली बार महसूस हुआ कि समस्या मेरे काम में नहीं थी। समस्या इस बात में थी कि वे मेरे काम को किस दृष्टि से देख रहे थे।

उन्होंने यह नहीं देखा कि मैं एक व्यवसाय चला रही हूँ।

उन्होंने यह नहीं देखा कि मेरे साथ अन्य महिलाएँ भी काम कर रही हैं।

उन्होंने यह नहीं देखा कि मैं अपनी रचनात्मकता को आकार दे रही हूँ।

उन्होंने यह नहीं देखा कि मैं अपने सपनों को जीने का प्रयास कर रही हूँ।

उन्होंने केवल यह देखा कि एक विवाहित महिला स्वयं अपने उत्पाद बेच रही है।

और शायद इस पूरे अनुभव का सबसे महत्वपूर्ण निष्कर्ष यही है कि उन्होंने मेरे काम को मेरे व्यक्तित्व, मेरी रचनात्मकता या उन महिलाओं की आजीविका के संदर्भ में नहीं देखा जो इस काम से जुड़ी थीं। उन्होंने उसे केवल एक पुरुष की सामाजिक प्रतिष्ठा के चश्मे से देखा।

यही वह क्षण था जब मुझे एहसास हुआ कि समाज बदल तो रहा है, लेकिन स्त्री के काम को उसकी अपनी उपलब्धि मानने की यात्रा अभी अधूरी है।

आज भी बहुत से लोग मानते हैं कि यदि कोई महिला काम कर रही है, तो उसके पीछे कोई आर्थिक मजबूरी होगी। वे यह स्वीकार करने में कठिनाई महसूस करते हैं कि काम किसी स्त्री के लिए आत्म-अभिव्यक्ति भी हो सकता है, रचनात्मकता भी हो सकता है, आनंद भी हो सकता है और समाज में योगदान का माध्यम भी हो सकता है।

मुझे लगता है कि हमारे समाज में संघर्ष करती हुई महिला को अपेक्षाकृत आसानी से स्वीकार कर लिया जाता है। यदि वह मजबूरी में काम कर रही है, तो लोग सहानुभूति रखते हैं। लेकिन यदि वही महिला अपनी इच्छा से काम कर रही हो, आर्थिक रूप से सुरक्षित हो और फिर भी कुछ नया बनाना चाहती हो, तो वह कई लोगों की स्थापित धारणाओं को चुनौती देने लगती है।

समाज में बहुत परिवर्तन आया है। यह भी सच है कि आज पहले की तुलना में अधिक महिलाएँ अपने सपनों को जी रही हैं। लेकिन यह भी उतना ही सच है कि परंपरागत सोच की एक परत आज भी जीवित है। अधिकांश समय वह दिखाई नहीं देती, लेकिन अवसर मिलने पर वह अपनी उपस्थिति दर्ज अवश्य कराती है।

फिर भी मैं काम करती हूँ।

इसलिए नहीं कि मुझे किसी को कुछ साबित करना है।

इसलिए नहीं कि मुझे अपनी पसंद का बचाव करना है।

मैं काम करती हूँ क्योंकि सृजन मुझे खुशी देता है।

मैं काम करती हूँ क्योंकि इससे कई अन्य महिलाओं के घरों में भी आय पहुँचती है।

मैं काम करती हूँ क्योंकि मेरे लिए काम केवल कमाई नहीं, बल्कि अभिव्यक्ति है।

और शायद यही वह बात है जिसे समाज को अभी पूरी तरह समझना बाकी है—

जब एक महिला काम करती है, तो वह केवल पैसे नहीं कमाती।

वह पहचान बनाती है।

वह अवसर पैदा करती है।

वह आत्मविश्वास गढ़ती है।

और कई बार अनजाने में उन पुरानी मान्यताओं को भी चुनौती देती है, जो सदियों से यह तय करती आई हैं कि उसे कैसा जीवन जीना चाहिए।

सुनीता धारीवाल 

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