एक वैचारिक लेख — मानवीय व्यवहार और अपेक्षाओं का गहरा विश्लेषण
अक्सर समाज में यह एक आम शिकायत सुनने को मिलती है कि "हमने जिसकी मुसीबत में मदद की, वही हमसे दूर हो गया।" लोग अक्सर ऐसे व्यक्तियों को नाशुक्रा, मतलबी या अहसानफ़रामोश मान लेते हैं। चारों तरफ एक निराशावादी सोच घर कर जाती है कि भलाई का तो ज़माना ही नहीं रहा। लेकिन अगर हम इंसानी मनोविज्ञान और परिस्थितियों की गहराइयों में उतरें, तो सच इससे बिल्कुल अलग और बेहद स्वाभाविक नज़र आता है।
जीवन का चक्र ही ऐसा है जहाँ कभी हम किसी की मदद करने की स्थिति में होते हैं, तो कभी हमें स्वयं मदद की आवश्यकता होती है। यह पूरी तरह से समय और परिस्थितियों का खेल है। न तो किसी की सहायता करना बुरा है और न ही किसी से सहायता लेना। वास्तव में, समस्या उस सहायता के साथ अनजाने में जुड़ जाने वाली हमारी 'अपेक्षाओं' (Expectations) से उत्पन्न होती है, जो अंततः हमें दुखी करती हैं। आइए, इस बात को मनोवैज्ञानिक दृष्टिकोण से समझने का प्रयास करते हैं कि आखिर क्यों लोग मदद पाने के बाद दूरी बना लेते हैं।
१. हीनता की भावना और अतीत का डर
जब आप किसी व्यक्ति की सहायता करते हैं, तो उस क्षण जाने-अनजाने में आप एक ऊंचे पायदान पर होते हैं और सहायता प्राप्त करने वाला व्यक्ति निचले पायदान पर। किसी के सामने हाथ फैलाना या लाचार होना मनुष्य के भीतर हीनता की भावना (Inferiority Complex) को जन्म देता है। समय हमेशा एक जैसा नहीं रहता; व्यक्ति उस बुरे दौर से बाहर निकल जाता है, लेकिन उसका अतीत उसके साथ रहता है।
अब वह व्यक्ति जब भी अपने मददगार यानी आपको देखता है, तो उसे अपना वह कमज़ोर और लाचार वक्त याद आ जाता है। आपका चेहरा उसके लिए एक मनोवैज्ञानिक ट्रिगर बन जाता है, जो उसे बार-बार उसकी पुरानी बेबसी की याद दिलाता है। वह व्यक्ति आपका सामना करने से सिर्फ इसलिए बचता है ताकि वह उस नकारात्मक ऊर्जा और हीनता के अहसास से दूर रह सके। वह नाशुक्रा नहीं है, वह बस अपने उस कमज़ोर अतीत से दूर भागने का प्रयास कर रहा है।
२. सूक्ष्म दंभ और अहंकार का जन्म
कई बार हम सामने वाले की दयनीय स्थिति देखकर इतने भावुक हो जाते हैं कि उसके बिना मांगे ही आगे बढ़कर उसकी मदद कर देते हैं। उस समय हमें एक आंतरिक सुकून मिलता है। परंतु, जब सामने वाले की आँखों में लाचारी के आंसू होते हैं और वह हमारे सामने झुक रहा होता है, तो उसे देखकर हमारे भीतर एक बहुत ही बारीक, सूक्ष्म दंभ (Ego) जागृत हो जाता है।
मनोविज्ञान कहता है कि हमें वह सुकून इसलिए मिला क्योंकि उस व्यक्ति ने हमारी मदद स्वीकार करके हमें 'ऊंचा' होने का अवसर दे दिया। हमारा 'मैं' यानी अहंकार बड़ा हो जाता है। भूल तब होती है जब हम मन में एक अनजानी अपेक्षा रख लेते हैं, जिसकी खबर सामने वाले को बिल्कुल नहीं होती।
सत्य की कसौटी: सच तो यह है कि जब आपने किसी की मदद की और उस वक्त आपको जो आंतरिक खुशी और संतोष मिला, आपकी भलाई का पुरस्कार तो आपको उसी क्षण मिल गया था। हिसाब तो वहीं चुकता हो गया था।
३. गरिमा को ठेस और सामाजिक प्रदर्शन
अक्सर लोग मदद करने के बाद एक बड़ी भूल कर बैठते हैं। वे उस इंसान को, उसके परिवार को, या उसके मासूम बच्चों को बार-बार उस मदद का अहसास कराते हैं। जब भी मिलते हैं, तुरंत यह जता देते हैं कि "देखो तुम्हारा कैसा समय था और मैंने तुम्हारी कितनी मदद की थी!" इतना ही नहीं, पीठ पीछे समाज में दूसरों के सामने भी इसका बखान किया जाता है।
कोई भी आत्मसम्मान वाला व्यक्ति अपनी गरिमा और प्रतिष्ठा को बार-बार ठेस पहुँचते हुए नहीं देख सकता। जब किसी के स्वाभिमान पर चोट लगती है, तो नतीजा यही होता है कि वह व्यक्ति धीरे-धीरे दूरी बनाना ही उचित समझता है।
एक व्यावहारिक और आत्मीय दृष्टिकोण
यदि हम वास्तव में किसी की मदद करना चाहते हैं, तो हमारा दिल बहुत बड़ा होना चाहिए। हमें स्वयं को भाग्यशाली समझना चाहिए कि प्रकृति ने हमें देने वाला बनाया है, लेने वाला नहीं। मदद कीजिए, उसका आनंद महसूस कीजिए और उसे वहीं भूल जाइए। जो मदद देकर जता दी गई, वह सहायता नहीं बल्कि एक सौदा बन जाती है। और सौदा तो व्यापार है, जहाँ नफ़ा-नुकसान तय है।
जब आप समझदारी से मदद लेने वाले व्यक्ति की व्यक्तिगत और सामाजिक गरिमा का सम्मान करते हैं, और उसे कभी अहसान का अहसास नहीं होने देते, तो वह व्यक्ति जीवन भर आपका सच्चा हितैषी बना रहता है। ऐसा करके आप समाज में एक व्यक्ति को खोते नहीं हैं, बल्कि एक मजबूत और वफ़ादार दोस्त कमा लेते हैं, जो आपके सुख-दुख में हमेशा आपके साथ खड़ा रहेगा। भविष्य में जब भी आप उससे मिलेंगे, तो आपको देखकर उसके चेहरे पर आने वाली सच्ची मुस्कान ही आपकी भलाई का सबसे बड़ा उपहार होगी।
सच्ची सहायता वही है जो चुपचाप, सम्मान के साथ की जाए और जिसे करके भुला दिया जाए।
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