मृत्यु नहीं, महायात्रा
मनुष्य की जिज्ञासा ने उसे मंगल तक पहुँचा दिया है। जब हम बच्चे थे, तब जिज्ञासा होती थी कि बड़े होकर कैसे दिखेंगे, क्या बनेंगे। अब जब अधेड़ उम्र भी पार होने लगी है, तो मन में एक नया प्रश्न उठता है—हम कब और कैसे मरेंगे?
यह एक बड़ा रहस्य है। हम नहीं जानते कि हमारी मृत्यु कब, कहाँ और कैसे होगी। बस इतना तय है कि एक दिन जाना सबको है। पके फलों का गिरना उत्सव है, कच्चे फलों का गिरना मातम। और हम शायद अब पके और ज़्यादा पके के बीच कहीं खड़े हैं।
गिरना तो है, पर कब? अपना पूरा समय लेकर या किसी आंधी-तूफान के पहले ही झोंके में? यह कोई नहीं जानता।
स्वर्ग-नरक, हेवन-हेल, जन्नत-दोज़ख—इन धारणाओं पर मेरा विश्वास नहीं है। शायद इसी कारण मुझे मृत्यु से भय नहीं लगता। हाँ, कौतूहल अवश्य है। मुझे लगता है कि मृत्यु के बाद मैं इस विराट ब्रह्मांड के मूल तत्वों में विलीन हो जाऊँगी और मेरी कॉस्मिक यात्राएँ आरम्भ होंगी। मैं अलग-अलग आकाशगंगाओं और ब्रह्मांडों में पर्यटन करूँगी—बिना एक पैसा खर्च किए।
हम इसी ब्रह्मांड के तत्वों से बने हैं और अंततः वहीं लौट जाना है। खुशी-खुशी।
विज्ञान भी आज यही कहता है कि हमारे शरीर के अधिकांश परमाणु उन्हीं तारों के भीतर बने थे जिनसे ग्रह और आकाशगंगाएँ बनीं। कार्बन, ऑक्सीजन, नाइट्रोजन, कैल्शियम और फॉस्फोरस—ये सभी तत्व किसी समय तारों के हृदय में जन्मे थे। प्रसिद्ध खगोलशास्त्री कार्ल सगन ने कहा था—
"हम तारों की धूल से बने हैं।"
भारतीय दर्शन ने इसे सदियों पहले ही कह दिया था—"यथा पिंडे तथा ब्रह्माण्डे।"
मानव शरीर की राख और ग्रहों की धूल एक जैसी नहीं होती, पर दोनों के मूल तत्व एक ही ब्रह्मांडीय स्रोत से आते हैं। यह विचार मुझे आकर्षित करता है। शायद इसलिए कि इसमें अलगाव नहीं, एकत्व का बोध है।
मुझे ब्रह्मांड से प्रेम है। आसमान की ओर ताकना मेरा प्रिय शगल है। मैं घंटों तारों को निहार सकती हूँ। उनसे बातें करती हूँ। मुझे लगता है कि वे मेरी बातें सुनते हैं।
और एक दिन मैं भी उड़ते-बहते कणों में बदलकर इन्हीं के बीच चली जाऊँगी। अपने मूल में लौटने का विचार मुझे भय नहीं, उत्साह देता है। शरीर की यात्रा पूरी होगी तभी तो महायात्रा आरम्भ होगी।
मेरा यह मानना कि स्वर्ग-नरक जैसी कोई व्यवस्था नहीं है, मुझे मृत्यु के भय से मुक्त करता है। हम सूर्य-पूजक सभ्यता के लोग हैं। हमारे भीतर जो ऊर्जा का प्रकाश है, वह कभी मरता नहीं—बस रूप बदलता है।
इसलिए यहीं, इसी जीवन में, अच्छे कर्म करते चलो। बिना इस चिंता के कि यमराज के बही-खाते में दया, करुणा, दान और पुण्य दर्ज हो रहे हैं या नहीं। अच्छाई का मूल्य किसी परलोक के पुरस्कार में नहीं, बल्कि इसी जीवन की सार्थकता में है।
अरबों वर्षों से यह यात्रा चल रही है और आगे भी चलती रहेगी—निर्विघ्न, निरंतर।
बस जीवन का आनंद लो।
मौज लो, रोज़ लो। ना मिले तो खोज लो।
सुनीता धारीवाल
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