रविवार, 22 मार्च 2020

बदरी बाबुल के अंगना जइयो
जइयो बरसियो कहियो
कहियो कि हम हैं तोरी बिटिया की अँखियाँ

बदरी बाबुल के अंगना जइयो . . .
मरुथल की हिरणी है गई सारी उमरिया
कांटे बिंधी है मोरे मन कि मछरिया
बिजुरी मैया के अंगना जइयो
जइयो तड़पियो कहियो
कहियो कि हम हैं तोरी बिटिया कि सखियाँ

बदरी बाबुल के अंगना जइयो . . .
अब के बरस राखी भेज न पाई
सूनी रहेगी मोरे वीर की कलाई
पुरवा भईया के अंगना जइयो
छू-छू कलाई कहियो

कहियो कि हम हैं तोरी बहना की राखियाँ 

कुँवर बेचैन जी की कविता

शनिवार, 21 मार्च 2020

रंगो से रंगे है गली नुक्कड़ बाज़ार 
अबीर गुलाल लाल पीले नीले हरे 
ढेरो खुशबूओं वाले रंगीन पानी 
खाली भरी पिचकारी 
सब देखा आँखों से 
छू कर भी देखा 
कैद किया आँखों में 
जो भी रंग और मेले है 
चन्द लम्हों में धूल गए 
जब याद तुम्हारी आई 
वो नन्ही सी पिचकारी 
जो मैंने ले कर दी थी  
जब तुम्हे पकड़नी भी नहीं आती थी 
चलाना तो दूर की बात थी 
और ठिठक कर घुल गए सभी रंग 
मेरे गाल पर टपकी दो बूंदों में 
और हंस दी मैं अपने आप 
जब पीछे से पुकारा था तुमने 
रंग लगवा लो प्लीज माँ

शनिवार, 14 मार्च 2020

आज तक हरे थे 
अभी कहाँ भरे थे 

पावँ के छाले 
सब देखे भाले 
खूब संभाले 

मैं अंग अंग रिसीे थी ।
कुचली थी और पिसी थी 

मरहम से लगे तुम 
सो लगा लिया 
बिन सोचे  समझे 

आज मरहम हटाई है 
तल में दर्द दुहाई है 

जो गहरे थे कहाँ भरे है 
जख्म तो अपने  हरे भरे है 

बाकि फिर कभी
@sd

रविवार, 8 मार्च 2020

पागलपन वाला प्यार 
वो तो मुझे हुआ था 
उस ने तो बस 
छुआ था मुझे 
मेरे आग्रह करने पर 
उसके पैरों में जंजीरे थी 
और मैं 
उड़ना चाहती थी 
उसका हाथ पकड़ कर 
सात आसमानों में 
जो हो नही सकता था 
उसे जंजीरों से प्यार था 
और मुझे उस से 
वह वहीं रहा 
मैं आगे बढ़ गई 
थोड़ी सी वहीं रह गई 
उसी के पास 
बाकी जो थी 
वह चल दी थी 
भीड़ के पीछे 
कहीं भी नही जाने को
बस चल रही थी 
रेंगते हुए 
उड़ने का ख्याल भी 
पांव के छालों में 
घुल कर पीड़ा देता है 
अब नही होता 
उड़ना चलना और रेंगना 
अब तो बस बैठ गई हूं 
सड़क  के एक किनारे 
सड़क चल रही है 
मैं नही
तालुक्क् है आजकल मेरा जिस यार से 
कम ही देखता है मुझे प्यार से

रोके से मेरे भी रुकता नहीं 
निकले है बाहर मेरे इख़्तियार से

डरता है बढ़ जाएँ न  मुश्किलें कही
एतबार नहीं करता किसी ऐतबार पे  

टूट कर चाहेगा जब एतबार कर लेगा 
अभी तो शक है उसे मेरे करार पे

पाले है वो तूफान  हकीकतों के साथ 
आये न उसका मन किसी खुशगवार पे

कितना आदी है वो जमीं पे चलने का 
वो रखता नहीं नज़र किसी भी सवार पे

चन्द रोज बस चलना था संग मुझे 
करता नहीं वो साँझ अस्थाई खुमार से

फूंक फूंक रखे है हर कदम अपना 
अक्ल ज्यादा रखे है मुझ समझदार से

क्या जानू मैं उसके दिल की बात 
रखे है दूर खुद को मेरे बुखार से

सुनीता धारीवाल 

नए मिजाज की है यह पुरानी कविता

सोमवार, 2 मार्च 2020

शनिवार, 29 फ़रवरी 2020

थोड़ा सा माहौल बनाना होता है,
वर्ना किस के साथ ज़माना होता है!

सच्चा शेर सुनाने वाले ख़त्म हुए,
अब तो ख़ाली खेल दिखाना होता है
            

ऐसी कोई बात नहीं मायूसी की,
सच में थोड़ा सा अफ़्साना होता है!

  सब की अपनी एक इकाई होती है,
 सब का अपना एक ज़माना होता है

दुनिया में भरमार है नकली लोगों की
सौ में कोई एक दीवाना होता है

रात हमारे घर जल्दी आ जाया कर
हमें सवेरे काम पे जाना होता है

आज बिछड़ते वक़्त मुझे मालूम हुआ
लोगों में अहसास का खाना होता है

लाल किले की दीवारों पर लिखवादो 
दिल सबसे महफूज़ ठिकाना होता है

अच्छे लोगों पर ही उँगली उठती है
सच की किस्मत में अफसाना होता है

आंसू पहली शर्त है इस समझौते की
गम तो साँसों का जुर्माना होता है

इश्क में सब खुश होकर सूली चढ़तें हैं
सारा ज़ब्र रज़ाकराना होता है

ज़ब्र----दमन
रज़ाकराना--स्वेच्छा से

Shakeel Jamali