रविवार, 8 मार्च 2020

पागलपन वाला प्यार 
वो तो मुझे हुआ था 
उस ने तो बस 
छुआ था मुझे 
मेरे आग्रह करने पर 
उसके पैरों में जंजीरे थी 
और मैं 
उड़ना चाहती थी 
उसका हाथ पकड़ कर 
सात आसमानों में 
जो हो नही सकता था 
उसे जंजीरों से प्यार था 
और मुझे उस से 
वह वहीं रहा 
मैं आगे बढ़ गई 
थोड़ी सी वहीं रह गई 
उसी के पास 
बाकी जो थी 
वह चल दी थी 
भीड़ के पीछे 
कहीं भी नही जाने को
बस चल रही थी 
रेंगते हुए 
उड़ने का ख्याल भी 
पांव के छालों में 
घुल कर पीड़ा देता है 
अब नही होता 
उड़ना चलना और रेंगना 
अब तो बस बैठ गई हूं 
सड़क  के एक किनारे 
सड़क चल रही है 
मैं नही
तालुक्क् है आजकल मेरा जिस यार से 
कम ही देखता है मुझे प्यार से

रोके से मेरे भी रुकता नहीं 
निकले है बाहर मेरे इख़्तियार से

डरता है बढ़ जाएँ न  मुश्किलें कही
एतबार नहीं करता किसी ऐतबार पे  

टूट कर चाहेगा जब एतबार कर लेगा 
अभी तो शक है उसे मेरे करार पे

पाले है वो तूफान  हकीकतों के साथ 
आये न उसका मन किसी खुशगवार पे

कितना आदी है वो जमीं पे चलने का 
वो रखता नहीं नज़र किसी भी सवार पे

चन्द रोज बस चलना था संग मुझे 
करता नहीं वो साँझ अस्थाई खुमार से

फूंक फूंक रखे है हर कदम अपना 
अक्ल ज्यादा रखे है मुझ समझदार से

क्या जानू मैं उसके दिल की बात 
रखे है दूर खुद को मेरे बुखार से

सुनीता धारीवाल 

नए मिजाज की है यह पुरानी कविता

सोमवार, 2 मार्च 2020

शनिवार, 29 फ़रवरी 2020

थोड़ा सा माहौल बनाना होता है,
वर्ना किस के साथ ज़माना होता है!

सच्चा शेर सुनाने वाले ख़त्म हुए,
अब तो ख़ाली खेल दिखाना होता है
            

ऐसी कोई बात नहीं मायूसी की,
सच में थोड़ा सा अफ़्साना होता है!

  सब की अपनी एक इकाई होती है,
 सब का अपना एक ज़माना होता है

दुनिया में भरमार है नकली लोगों की
सौ में कोई एक दीवाना होता है

रात हमारे घर जल्दी आ जाया कर
हमें सवेरे काम पे जाना होता है

आज बिछड़ते वक़्त मुझे मालूम हुआ
लोगों में अहसास का खाना होता है

लाल किले की दीवारों पर लिखवादो 
दिल सबसे महफूज़ ठिकाना होता है

अच्छे लोगों पर ही उँगली उठती है
सच की किस्मत में अफसाना होता है

आंसू पहली शर्त है इस समझौते की
गम तो साँसों का जुर्माना होता है

इश्क में सब खुश होकर सूली चढ़तें हैं
सारा ज़ब्र रज़ाकराना होता है

ज़ब्र----दमन
रज़ाकराना--स्वेच्छा से

Shakeel Jamali
तहे  जोड़ी है उम्र भर भावनाओ के लिबासो की 
करीने से रखा था मन की अलमारी में 
आज एक तह क्या खिसकाई 
कि हर तह फिसल आ  गिरी आभासों की 
खुल गई तहे  सब ढेर लग गया कदमो में 
इतना झुकि उठाने को कि उठ नहीं पाई
कुछ  तहे बोली कुछ  कह भी न पाई 
कुछ ने आँख मिलाई कुछ ने आँख चुराई 
कुछ तह मुस्काई कुछ थी एकदम  पथराई 
कुछ तहें आज भी   मेरी समझ नहीं आई 
कुछ सलवटे कभी नहीं निकली 
तहों बीचउनकी  मुंह चिढाती किकली 
हर बार तहे बदलती हूँ कि संभली रहे 
 निशान न पड़ें ,कीड़े न लगे , उमस में न गले 
आज सुबह सुबह सब लिबास रख दिए बाहर 
कि अब नहीं तहे लगाउगी न सलवटे गिनुंगी 
खाली कर दूंगी सब अलमारिया मन की 
कुछ नया सिलवाऊँगी पहनूंगी भूल जाउंगी 
दिल से नहीं लगाऊँगी कभी न तहे जमाऊँगी

सुनीता धारीवाल जांगिड

रविवार, 23 फ़रवरी 2020

अपना ही घर कोई जलाता है क्या 
अपनी ही मौत कोई बुलाता है क्या 
ये बवाल ये बवंडर ये  धुँआ ये  राख
 है सब क्षितिज की ओर 
बरसेगा अब निवेश तेजाब सा 
उगेगी फसल भाईचारे की कसैली सी 
लिखूंगी मैं भी कुछ यादें मटमैली सी

शनिवार, 22 फ़रवरी 2020

मैं नदी हूँ मेरा बहना जरुरी है 
मेरा सब कुछ कहना जरुरी है 

बांध थे गिर्द  तो सूखने लगी थी 
बहती ही रहूँ कि भरना जरूरी है 

तपता सूरज  सुनसान जमीं 
भरे बादल सा तेरा मंडराना जरुरी है 

मैं हाथ खोल जब आस करूँ 
तेरा जम के बरस जाना जरूरी है
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