वरिष्ठ सामाजिक चिंतक व प्रेरक सुनीता धारीवाल जांगिड के लिखे सरल सहज रोचक- संस्मरण ,सामाजिक उपयोगिता के ,स्त्री विमर्श के लेख व् कवितायेँ - कभी कभी बस कुछ गैर जरूरी बोये बीजों पर से मिट्टी हटा रही हूँ बस इतना कर रही हूँ - हर छुपे हुए- गहरे अंधेरो में पनपनते हुए- आज के दौर में गैर जरूरी रस्मो रिवाजों के बीजों को और एक दूसरे का दलन करने वाली नकारात्मक सोच को पनपने से रोक लेना चाहती हूँ और उस सोच की फसल का नुक्सान कर रही हूँ लिख लिख कर
शुक्रवार, 17 जनवरी 2020
गजल
बुधवार, 20 नवंबर 2019
बुधवार, 30 अक्टूबर 2019
नीड़
शनिवार, 17 अगस्त 2019
बहुत मजबूत डोर से बंधा
भाई मेरा
भोगौलिक दूरी पर
आज मुझे ताकता है
और पा लेता है
आती जाती ध्वनियों में
तरंगो में
और हम बात भी करते है
बिना कुछ कहे सुने
अति सूक्षम कुछ अहसास
हम करते है
बिना कलाई को छुए
और बिना किसी धागे
और मनाते है साल दर साल
यूँ ही खूबसूरत सा
बिना औपचारिकता
रक्षा बंधन
जानती हूँ वो प्राण है
मैं देह।। निसंदेह