सफर सिरफिरा है
पगडण्डियां नहीं है
रास्ते चुन रहा है
बेआवाज़ मंजिलें है
बस शोर सुन रहा है
सफर सिरफिरा है
चल सरक सरक रहा है
नई राहे चुन रहा है
मतवाला है अकेला है
दिशा से रिश्ते बुन रहा है
सफर सिरफिरा है
घूमे है गोल मोल सा
खुद अपना सर धुन रहा है
सफर सिरफिरा है
बन के मेरा हमसफ़र ये
कांटे राह के चुन रहा है
ये सफर सिरफिरा है
जैसे मैं भी सिरफिरा हूँ
चलो रोक से समय को
मेरे सामने उड़ रहा है ।
ये सफर सिरफिरा है ।
मैंने सर पे रख लिया है
मेरे ही सर चढ़ गया है ।
ये मेरा सफर सिरफिरा है
सुनीता धारीवाल
वरिष्ठ सामाजिक चिंतक व प्रेरक सुनीता धारीवाल जांगिड के लिखे सरल सहज रोचक- संस्मरण ,सामाजिक उपयोगिता के ,स्त्री विमर्श के लेख व् कवितायेँ - कभी कभी बस कुछ गैर जरूरी बोये बीजों पर से मिट्टी हटा रही हूँ बस इतना कर रही हूँ - हर छुपे हुए- गहरे अंधेरो में पनपनते हुए- आज के दौर में गैर जरूरी रस्मो रिवाजों के बीजों को और एक दूसरे का दलन करने वाली नकारात्मक सोच को पनपने से रोक लेना चाहती हूँ और उस सोच की फसल का नुक्सान कर रही हूँ लिख लिख कर
गुरुवार, 6 अक्टूबर 2016
सफ़र सिरफिरा है
गजल भी हो जायेगी
प्यार हो जायेगा तो ग़ज़ल भी हो जायेगी
सूखी दिल की धरती भी सजल हो जायेगी
कोई दीखता नहीं वीरान बस्ती में दिया उठाये
कोई मिल जायेगा तो रौशनी भी हो जायेगी
तरंगें रूह की टकराती नहीं किसी की रूह से
कहीं भिड़ी तो साँस ये तूफ़ान सी हो जाएँगी
कोशिश बहुत की कि लिखूं ग़ज़ल कोई गाने वाली
न कोई आएगा न कोई ग़ज़ल ही बन पायेगी
नकली तो कभी कुछ कहा नहीं जाता मुझसे
सोच भी लुंगी तो दुनिया को खबर हो जायेगी
सुनीता धारीवाल जांगिड़
सोमवार, 19 सितंबर 2016
घाट घाट का पानी

कविता -घाट घाट का पानी
ठीक ही तो कहते हो
सही पहचाना
घाट घाट का पानी
पिया है मैंने
यही रहा मेरा
आजीवन पर्यटन
कितने मंदिरो मस्जिदो गुरुद्वारों के घाट
पहुंची भी और पानी चखा भी
कितने तालाबो का कीचड़ सना पानी
जो नहाने भर का था वो पिया भी
कभी संतान के लिए
कभी तुम्हारे लिए
कभी रियाया के लिए
जिन घाटो पर तर्पण होता है
वह भी चखे मैंने
जहाँ नव विधवाएं चूड़ियाँ तोड़
वैधव्य स्नान करने जाती है
उन घाटो का जल भी
अंजुली भर चखा मैंने
जिन जोहड़ो पर अल सुबह लोग
पाणी कानी के हाथ धोने
जा पहुँचते है
उसका भी स्वाद कहाँ अछूता मुझ से
उन नमक डले लोटों का जल
भी चखा है मैंने
जिन्हें पंच्यात बीच बैठ भरा जाता है
और नमक डाल शपथ ली जाती है कि
बिरादरी बीच का मामला है
कोई ठाणे नहीं जाएगा
गरीब की बेटी लुटी आबरू
और क़त्ल का मामला
यहीं लोटे के सामने सुलझाया जायेगा
याद आया मैंने तो
उस तालाब का जल भी मुहँ लगाया है
जहाँ सर पर मैला ढोने वाली औरत ने
टोकरा एक ओर रख अपना सर धुलवाया है
गावं देहात की गली गली में खुले
उन छोटे छोटे पूछाघरों की अँधेरी
गुफाओ में जहाँ भूत प्रेत
बदन उघाड़ कर डराए जाते हैं
और जल में कुछ मन्त्र फूक
प्रेत भगाए जाते है
उन बंद बोतलों का पानी भी मैंने
पी कर दिखाया है
बड़े बड़े यज्ञो में आचमन का जल
मैंने पिया है
कलश यात्राओ के कलशों में भरा
कभी 21 कभी 31 घाटो का पानी
भी मैंने पिया है
वाल्मिक का चमार का ,
खाती का लुहार का
सिकलीगर का सिहमार का
बैरागी का सुनार का
जाट का सैनी का
धोबी का कुम्हार का
पंडित का रेफूजी का
धानक का सरदार का
अड़तीस जात के घर भीतर
नलको का पानी
उन्ही के बर्तनों में पिया
और जिया है मैंने
रंडी की दुकान का
कोठे की मचान का
मंडी के सुलतान का
बाबे की कोठी आलिशान का
पानी भी कहाँ रहा अछूता
मेरी जिह्वा की तंत्रिकाओं से
राज दरबार के घाट का
राजाओ के ठाठ का
मंत्रिओं की बाँट का
सत्ता की आंट का
पानी पिया है मैंने
कुत्तो के पात्र का
गरीब किसी छात्र के
अभावग्रस्त गिलास का
पानी पिया है मैंने
हरी के द्वार का
पीर की मजार का
पानी पिया है मैंने
देसी का अंग्रेजी का
कच्ची दारू की भट्टी का
डूम का मिरासी का
ये दुनिया लाख चौरासी का
पानी पिया है मैंने
ये घाट घाट का पानी
जब चखा तो यकीन मानो
पानी सर चढ़ गया
फिर तो एक घाट भी नहीं छोड़ा
और पीने से मुख न मोड़ा
जितने भी घाट मैंने गिनवाये है
तुम्हारी कसम मैंने नहीं बनवाये है
ये सब तुमने ही बनाये थे मेरे लिए
कि मैं जल से बाहर ही न निकलूं
इसे आँखों में भी रखूं
इसे देह में भी रखूं
और तुम्हारे दैहिक जलप्रपात तले
अपना वजूद तलाशूँ
यकीन मानो जितना भी पानी
अपनी देह की गुफाओं से
निगला है
सब का सब आँखों से झरा है
मन की उलझी कंदराओं से
जबरन खींचा था जो पानी
माँ कसम खारा ही नहीं
तेजाबी हो कर मेरी
आँखों के कोरो में जा बैठा है
कितने कड़वे घूँट
पी कर मुसुकुरायी हूँ मैं
अब तो पकी उम्र के रोयें
पानीयों के बांध बनाना सीख गए हैं
समेट लेते है सारा पानी
और मैं अब भी विचरती हूँ
नए नए घाट
ताकि
घाट घाट जा कर
एक दिन खुद को पा लूँ
और उस दिन तुम कहो
घाट घाट का पानी पिए
बेगैरत औरत
और हाँ
घाट घाट का पानी पीते पीते
मैं घाट घाट की बोली भी
सीख गयी हूँ
मुझे अब शर्म नहीं आती
गरियाने में
मैं जानती हूँ कहाँ शिष्ट होना है
कहाँ शिष्टाचार खोना है
बस मेरी इसी समझ से
थोडा डर सा गया है
जमाना मुझ से
और आजकल मेरे मुहँ कम ही लगता है
सुनीता धारीवाल जांगिड
रविवार, 18 सितंबर 2016
आखर इश्क़ कविता पाठ प्रदर्शन हुआ सफल

वरिष्ठ कवियत्री राजेंदर कौर ने नए चंडीगढ़ शहर का खूबसूरत वर्णन करते हुए कहा -मेरा शहर चंडीगढ़ सोहना अते प्यारा -साफ़ साफ़ टे पक्का पक्का ए सारे द सारा -और लोकप्रिय वरिष्ठ कवियत्री सुश्री मंजीत इंदिरा ने खूबसूरत गज़ल गा कर पता हुंदा सादे नाल होनियाँ निरालियाँ कच्चियाँ कचूरा नाल पौंदे न प्यालियाँ समां बाँध दिया . इस यादगार शाम में कवियत्रियों ने खूब प्रसंशा बटोरी
शनिवार, 10 सितंबर 2016
सुन ससुराल -मुंबई निवासी संगीता जांगिड की लिखी कविता
कविता सुन ससुराल
अच्छा लगता हैं तेरा साथ
अब तक जो किया सफर
थामकर तेरा हाथ
पहला पाँव जब धरा था
तेरे नाम से ही मन डरा था
बिन आवाज़ थालियों को उठाया था
साड़ी में एक एक कदम डगमगाया था
रस्मों रिवाजों को तहेदिल से निभाया था
खनकती चुड़ियों से कड़छी को चलाया था
डरते डरते पहली बार खाना बनाया था
बस ऐसे ही मैंने
सबको अपना बनाया था
सुन ससुराल
तुम साक्षी हो मेरे एक एक पल के
वो पिया मिलन
वो पहली बार जी मिचलाना
खट्टी चीज़ों पर मन ललचाना
वो पहली बार
अपने अंदर जीवन महसूस करना
कपड़े सुखाने आँगन में डोलना
पापड़ का कच्चा कच्चा सा सेंकना
गोल रोटी के लिये जद्दोजहद करना
दाल का तड़का, दूध का उफनना
कटी हुई भिंडी को धोना
पहली बार हलवे का बनाना
पहली दिवाली पर दुल्हन सी सजना
करवा चौथ पर मनुहार करवाना
हाँ ससुराल
तुम्हीं ने दिये ये अनमोल पल
वधु बन आयी थी
तुम्हीं थे जिसने सर आँखों बैठाया
बड़े स्नेह से अपनापन जताया
यही आकर मैंने सब सीखा और जाना
कभी किसे मनाया तो कभी किसे सताया
एक ही समय में
मैंने कितने किरदारों को निभाया
खुद को खो खोकर मैंने खुद को पाया
सुन ससुराल
मायके के आगे भले ही
हमेशा उपेक्षित रहे तुम
लेकिन
फिर भी मेरे अपने रहे तुम
मायके में भी मेरा सम्मान रहे तुम
मेरे बच्चों की गुंजे जहाँ किलकारियाँ
वो आँगन रहे तुम
मेरे हर सुख दुख के साक्षी रहे तुम
सुन ससुराल
पीहर की गलियाँ याद आती हैं
गीत बचपन के गुनगुनाती हैं
लेकिन
मायके में भी तेरी बात सुहाती हैं
तेरा तो ना कोई सानी हैं
तू ही तो मेरे उतार चढ़ाव की कहानी हैं
कितने सबक़ तुने सीखाये
पाठशाला ये कितनी पुरानी हैं
सुन ससुराल
अब तू ससुराल नहीं
मेरा घर रुहानी हैं ।
सुनीता जांगिड मुंबई
संपर्क -wtvindia@gmail.com
गुरुवार, 1 सितंबर 2016
नारी कलम गोष्ठी तृतिय
आख़र इश्क़
खोज लेते हैं कुछ अक्षर
और अक्षर?
छटपटातें है
शब्द हुए जाने को
और शब्द ?
धुन की खोज में
बौराए घूमते हैं
और धुन?
है कि बस लग जाती है
और लागी?
है कि छूटती नहीं
अक्षरों से
"आख़र इश्क़"
बेवफा नहीं होता कभी

